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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, Verses 40–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, verses 40–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 40-48

संस्कृत श्लोक

अन्तर्लीनतरङ्गौघसौम्यवारिसरित्समा । निर्वाणाख्यं प्रकरणं ततः षष्ठमुदाहृतम् ॥ ४० ॥ शिष्टो ग्रन्थः परीमाणं तस्य ज्ञानमहार्थदः । बुद्धे तस्मिन्भवेच्छ्रेयो निर्वाणं शान्तकल्पनम् ॥ ४१ ॥ अचेत्यचित्प्रकाशात्मा विज्ञानात्मा निरामयः । परमाकाशकोशाच्छः शान्तसर्वभवभ्रमः ॥ ४२ ॥ निर्वापितजगद्यात्रः कृतकर्तव्यसुस्थितः । समस्तजनतारम्भवज्रस्तम्भो नभोनिभः ॥ ४३ ॥ विनिगीर्णयथासंख्यजगज्जालातितृप्तिमान् । आकाशीभूतनिःशेषरूपालोकमनस्कृतिः ॥ ४४ ॥ कार्यकारणकर्तृत्वहेयादेयदृशोज्झितः । सदेह इव निर्देहः ससंसारोऽप्यसंसृतिः ॥ ४५ ॥ चिन्मयो घनपाषाणजठरापीवरोपमः । चिदादित्यस्तपँल्लोकानन्धकारोपरोपमम् ॥ ४६ ॥ परप्रकाशरूपोऽपि परमान्ध्यमिवागतः । रुद्धसंसृतिदुर्लीलः प्रक्षीणाशाविषूचिकः ॥ ४७ ॥ नष्टाहंकारवेतालो देहवानकलेवरः । कस्मिंश्चिद्रोमकोट्यग्रे तस्येयमवतिष्ठते । जगल्लक्ष्मीर्महामेरोः पुष्पे क्वचिदिवालिनी ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

रहित हो जाता है अतएव देहयुक्त होने पर भी देह रहित सा संसार में रहने पर भी असंसारी हो जाता है, निविड पत्थर के हृदय की भाँति छिद्र रहित ओर वस्तुएँ भी जिसकी उपमा हों इस प्रकार का वह चैतन्यरूप सूर्य अपने अज्ञानसे कल्पित लोकों को आत्माकार वृत्ति से खूब प्रदीप्त हुए अपने प्रकाश से दीप्त करता हुआ भी (प्रकाशरूप होता हुआ भी ) दृश्य पदार्थो के न होने से ही उनके प्रकाश के अविषय में निविड हुए अन्धकाररूप पत्थर के सदृश परम अन्धकारको प्राप्त हुआ-सा हो जाता है, उसकी जन्ममरणरूप संसार की दुष्ट लीलाएँ शान्त हो जाती है ओर आशारूपी हैजा नष्ट हो जाता है । उसका अहंकाररूपी पिशाच नष्ट हो जाता है तथा वह शरीर रहित होता हुआ भी देहवान्‌ रहता हे । भगवती श्रुति भी कहती है - "अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्व-वस्थितम्‌। महान्त्‌ विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति" (शरीर रहित होता हुआ भी नश्वर शरीरो में स्थित महान्‌ विभु आत्मा को जानकर धीर पुरुष शोक नहीं करता) जैसे महान्‌ मेरु पर्वत के किसी एक प्रदेश में फूलमें भँवरी बैठी रहती है वैसे ही उसके सिरके रोम के अग्रभाग में अर्थात्‌ रोमकोटि के तुल्य परिच्छिन्न अविद्या के भी अग्रभाग में (एकदेश में) यह जगत्सम्पत्ति स्थित हे