Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, Verses 36–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, verses 36–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 36- 39
संस्कृत श्लोक
शान्तसंकल्पमत्ताभ्रभीषणाशनिशब्दवत् ।
विस्मृतस्वप्नसंकल्पनिर्माणनगरोपमा ॥ ३६ ॥
भविष्यन्नगरोद्यानप्रसूवन्ध्यामलाङ्गिका ।
तस्या जिह्वोच्यमानोग्रकथार्थानुभवोपमा ॥ ३७ ॥
अनुल्लिखितचित्रस्य चित्रव्याप्तेव भित्तिभूः ।
परिविस्मर्यमाणार्थकल्पनानगरीनिभा ॥ ३८ ॥
सर्वर्तुमदनुत्पन्नवनस्पन्दास्फुटाकृतिः ।
भाविपुष्पवनाकारवसन्तरसरञ्जना ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
४ कंकणता ओर तरंगता का सुवर्ण, जल के स्वरूप के बिना निरूपण नहीं हो सकता, अतः
वे मिथ्या हैं, वैसे ही यह भी मिथ्या है ।
उत्तरोत्तर भूमिका की प्राप्ति होने पर अधिक विनाश होने से दृश्य और अद्वृश्य संस्कारमात्र
से इसकी अवशिष्टता दृष्टान्तो से कहते हैं।
यह संसार अन्य के संकल्प से विरचित होने के कारण अन्य के चित्त मे स्थित अतएव
मिथ्याभूत, जिसमें संकल्प करनेवाले पुरुष के पास बैठे हुए अन्य पुरूष के स्वप्न के युद्ध और
वादविवाद से कुछ भी धन आदि वस्तु प्राप्त नहीं होती ऐसी, नगरश्री के समान है, मिथ्या होने
के कारण संसार और उक्त नगरश्री दोनों तुल्य हैँ, अतएव अन्य की क्रिया ओर शब्द के
अविषय भी हैं, वह जैसे स्वप्न देखनेवाले की दृष्टि से कुछ स्पष्ट दृश्य है, किन्तु संकल्प
करनेवाले की दृष्टि से तनिक भी दृश्य न होती हुई अपने आप शान्त हो जाती है वैसे ही यह
संसार बना है, यह भाव है ॥ ३ ५॥ उससे भी अधिक शान्तिका प्रकर्ष होने पर अदृश्य अवस्था
से अन्त में यह संसार शान्त हुए संकल्प से कल्पित मदोन्मत्त गजराज के समान निरंकुश मेघ
की भीषण गर्जना के समान, जिस नगरका स्वप्न द्वारा निर्माण या संकल्प द्वारा निर्माण भूल
गया हे, उस नगर के समान भावी (बनाये जानेवाले) नगर की वाटिका में बच्चा पैदा करनेवाली
बाँझ की स्त्री के समान शून्यस्वरूप से युक्त, उक्त वन्ध्या स्त्रीकी जिह्वा से कही जा रही अपने
पुत्र के युद्ध आदि की वीररस पूर्ण कथा के अर्थ के अनुभव के तुल्य, जिस घर में चित्र नहीं
लिखा गया उस घर की चित्रों से भरी हुई भीत की नाई, जिसकी अर्थशून्य कल्पना विस्मृत
होती जा रही है, उस कल्पित नगरी के सदुश, भावी फूलों के वन के आकाररूप वसन्त से
रसरंजित तथा सम्पूर्ण ऋतु ओं से युक्त होने पर भी अनुत्पन्न वन के स्पन्दन (उल्लास विकास)
के सदुश अस्पष्ट आकारवाला तथा तरंगमालाओं के अपने में समा जाने से अतिनिश्चल जल
से युक्त नदी के समान प्रतीत होता है