Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, Verses 13–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, verses 13–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 13-34
संस्कृत श्लोक
मुमुक्षुव्यवहाराख्यं ततः प्रकरणं कृतम् ।
सहस्रमात्रं ग्रन्थस्य युक्तिग्रन्थेन सुन्दरम् ॥ १३ ॥
स्वभावो हि मुमुक्षूणां नराणां यत्र वर्ण्यते ।
अथोत्पत्तिप्रकरणं दृष्टान्ताख्यायिकामयम् ॥ १४ ॥
सप्तग्रन्थसहस्राणि विज्ञानप्रतिपादकम् ।
जागती द्रष्टृदृश्यश्रीरहंत्वमितिरूपिणी ॥ १५ ॥
अनुत्पन्नैवोत्थितेव यत्रेति परिवर्ण्यते ।
यस्मिन्श्रुते जगदिदं श्रोतान्तर्बुध्यतेऽखिलम् ॥ १६ ॥
सास्मद्युष्मत्सविस्तारं सलोकाकाशपर्वतम् ।
पिण्डग्रहविनिर्मुक्तं निर्भित्तिकमपर्वतम् ॥ १७ ॥
पृथ्व्यादिभूतरहितं संकल्प इव पत्तनम् ।
स्वप्नोपलम्भभावाभं मनोराज्यवदाततम् ॥ १८ ॥
गन्धर्वनगरप्रख्यमर्थशून्योपलम्भनात् ।
द्विचन्द्रविभ्रमाभासं मृगतृष्णाम्बुवर्तनम् ॥ १९ ॥
नौयानलोलशैलाभं सत्यलाभविवर्जितम् ।
चित्तभ्रमपिशाचाभं निर्बीजमपि भासुरम् ॥ २० ॥
कथार्थप्रतिभासाभं व्योममुक्तावलीनिभम् ।
कटकत्वं यथा हेम्नि तरङ्गत्वं यथाम्भसि ॥ २१ ॥
यथा नभसि नीलत्वमसदेवोत्थितं सदा ।
अभित्तिरङ्गरहितमुपलब्धिमनोहरम् ॥ २२ ॥
स्वप्ने वा व्योम्नि वा चित्रमकर्तृ चिरभासुरम् ।
अवह्निरेव वह्नित्वं धत्ते चित्रानलो यथा ॥ २३ ॥
दधात्येवं जगच्छब्दरूपार्थमसदात्मकम् ।
तरङ्गोत्पलमालाभं दृष्टनृत्यमिवोत्थितम् ॥ २४ ॥
चक्रचीत्कारपूर्णस्य जलराशिमिवोद्यतम् ।
शीर्णपत्रं भ्रष्टनष्टं ग्रीष्मे वनमिवारसम् ॥ २५ ॥
मरणव्यग्रचित्ताभं शिलागृहगुहास्पदम् ।
अन्धकारगुहैकैकनृत्तमुन्मत्तचेष्टितम् ॥ २६ ॥
प्रशान्ताज्ञाननीहारं विज्ञानशरदम्बरम् ।
समुत्कीर्णमिव स्तम्भे चित्रं भित्ताविवोदितम् ॥ २७ ॥
पङ्कादिवाभिरचितं सचेतनमचेतनम् ।
ततः स्थितिप्रकरणं चतुर्थं परिकल्पितम् ॥ २८ ॥
त्रीणि ग्रन्थसहस्राणि व्याख्यानाख्यायिकामयम् ।
इत्थं जगदहंभावरूपस्थितिमुपागतम् ॥ २९ ॥
द्रष्टृदृश्यक्रमं प्रौढमित्यत्र परिकीर्तितम् ।
दशदिङ्मण्डलाभोगभासुरोऽयं जगद्भ्रमः ॥ ३० ॥
इत्थमभ्यागतो वृद्धिमिति तत्रोच्यते चिरम् ।
उपशान्तिप्रकरणं ततः पञ्चसहस्रकम् ॥ ३१ ॥
पञ्चमं पावनं प्रोक्तं युक्तिसंततिसुन्दरम् ।
इदं जगदहं त्वं च स इति भ्रान्तिरुत्थिता ॥ ३२ ॥
इत्थं संशाम्यतीत्यस्मिन्कथ्यते श्लोकसंग्रहैः ।
उपशान्तिप्रकरणे श्रुते शाम्यति संसृतिः ॥ ३३ ॥
प्रभ्रष्टचित्रसेनेव किंचिल्लभ्योपलम्भना ।
शतांशशिष्टा भवति संशान्तभ्रान्तरूपिणी ॥ ३४ ॥
अन्यसंकल्पचित्तस्था नगरश्रीरिवासती ।
अलभ्यवस्तुपार्श्वस्थस्वप्नयुद्धचिरारवा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
वैराग्य-प्रकरण के अनन्तर मुमुक्षु-व्यवहार नामक प्रकरण की रचना की गई है, इसमें
एक हजार श्लोक हैं। यह प्रकरण युक्तियों से बड़ा सुन्दर है। इसमें मुमुक्षु पुरुषों के स्वभाव का
वर्णन हे । इसके पश्चात् दृष्टान्त ओर आख्यायिकाओं से भरे हुए ज्ञानप्रद उत्पत्तिप्रकरण की
रचना की गई है । उस सात हजार श्लोक वाले प्रकरण में जगत् की (अहम्” "इदम्" स्वरूपवाली
दृष्टा और दृश्य के भेद की विचित्रतारूप सम्पत्ति वास्तव में उत्पन्न न हुई भी भ्रम से उत्पन्न
हुई-सी प्रतीत होती है, ऐसा वर्णन किया गया है । उक्त प्रकरण के सुनने पर श्रोता युष्मत्
और अस्मत् से युक्त, जिनका अर्थ भिन्न प्रतीत होता है, उन त्वंपद और अहंपद की एकार्थता
के प्रतिपादक अनन्त ब्रह्माण्डों के विस्तार से युक्त तथा प्रत्येक ब्रह्माण्ड में लोकालोक पर्वत
ओर आकाश से युक्त इस चराचर सम्पूर्ण जगत् को अपने हृदय में मूर्त द्रव्यता से रहित,
भेदशून्य, अतएव पर्वत आदि पदार्थो से रहित, पृथिवी आदि भूतो से रहित, संकल्पमय
(कल्पनामय) नगर के तुल्य असत्, स्वप्न मेँ जो मनोमय पदार्थ दिखाई देते हैं, उनके तुल्य,
मनोराज्य के समान स्थित, अर्थशून्य होने के कारण गन्धर्वं नगर के सदुश, दो चन्द्रमाओं की
भ्रान्तिके सदश, मृगतृष्णा मे जल की भ्रान्ति के समान समझता है तथा नाव आदि के चलने से
पर्वत, वृक्ष आदि के चलनभ्रम के सदृश, सत्य पुरुषार्थ से शून्य, चित्त के मोह से कल्पित भूत
के सदुश, निर्वीज होने पर भी (जगत् की बीज माया के मिथ्या होने से ओर आत्मा के निर्विकार
होने से बीजरहित होने पर भी) प्रकाशमान, कथा के अर्थ के प्रतिभास के समान (कथा सुनने
में आसक्ति होने से संस्कार द्वारा प्रत्यक्ष के सदुश कथा के अर्थ की प्रतीति होना लोक में
प्रसिद्ध है), आकाश में कल्पित मुक्तावली के सदश, सुवर्णं में कंकणत्व आदि की नाई एवं
जल में तरंगत्व की नाई (५६) ओर आकाश में नीलिमा के सदृश असत् ही यह सदा उत्पन्न
हुआ है, भीत (जिस पर चित्र बनाया जाता है) ओर विविध रंगों के बिना केवल प्रतीतिमात्र से
(पूर्व अनुभव के स्मरणमात्र से) मनोहर एवं कर्ता से रहित चित्र जैसे स्वप्न में या आकाश में
चिरकाल तक प्रतीत होता है तथा जैसे चित्रलिखित अग्नि अग्निन होने पर भी अग्नि सी
प्रतीत होती है, वैसे ही मिथ्याभूत यह प्रपंच जगत् शब्द के अनुरूप अर्थ को जाता है । (गच्छति)
यानी विचार मे नहीं ठहरता इस अर्थको-धारण करता हे । तरगों में भ्रान्ति से कल्पित नील
कमलो की माला के तुल्य, पहले देखे गये स्मृतिपथ में आरूढ हो रहे नृत्य के समान मन में
उत्थित, जैसे चित होकर सोये हुए पुरुष या कविको चक्रवाक के (चकवा पक्षी के) चीत्कार से
पूर्ण आकाश को देखनेपर यह तालाब है, ऐसी उत्प्रेक्षा होती है, वैसे ही यह जगत् भी उत्प्रेक्षित
हे । ग्रीष्म ऋतु में पत्तों से शून्य, सूखे हुए ओर सारहीन अतएव छाया, शोभा आदि से रहित
ओर फल आदि की समृद्धि से शून्य वन की नाई, मरण के समय में व्यग्र हुए लोगो के मन की
नाई (मरण के समय व्यग्र हुए लोगों का मन भ्रम और मूर्च्छा से युक्त ओर अस्थिर रहता हे,
यह प्रसिद्ध है), पर्वतो की गुफाओं की तरह (गुफाएँ अन्धकार से भरी हुई, शून्य ओर भयंकर
होती हैं, वैसे ही यह भी है), अन्धकारपूर्ण गुफामें प्रत्येक के नृत्य के सदृश, उन्मत्त पुरुषों की
चेष्टाओं के सदुश, भीतमें लिखे हुए चित्र एवं खम्भ मे खोदी हुई मूर्ति के समान तथा पंक आदि
से बनाई गई प्रतिमा के सदुश पृथक्सत्ता से शून्य है, ऐसा समझता है । परमार्थ दृष्टि से यह
प्रशान्त ओर अज्ञानरूपी कुहरे से शून्य ज्ञानरूपी शरत्काल के आकाश के सिवा अन्य कुछ
नहीं हे, अर्थात् अज्ञान के विकार के दूर होने पर यह नित्य निर्विशेष सच्चिदानन्द परब्रह्म में
पर्यवसित हो जाता है । तदुपरान्त चौथा स्थितिप्रकरण कहा गया है, तीन हजार श्लोकवाले
उस प्रकरण में प्रपंच ओर उसके अधिष्ठान तत्त्व का वास्तविक प्रतिपादन और कथाएँ प्रचुर
मात्रा में हैं। ब्रह्म ही द्रष्टा ओर दृश्य भाव को स्वीकार कर इस प्रकार जगत्-रूप से और
अहंरूप से स्थिति को प्राप्त हुआ है, ऐसा स्थितिप्रकरण में बतलाया गया है, दस दिशाओं के
मण्डल की विशालता से देदीप्यमान यह जगद्भ्रम चिरकाल से इस प्रकार वृद्धि को प्राप्त
हुआ, यह बात उसमें भली-भाँति समझाई गई हे । तदनन्तर पाँच हजार श्लोकों से विरचित
परम पवित्र तथा विविध युक्तियोँ से अतिरमणीय पाँचवाँ उपशान्तिप्रकरण कहा गया हे ।
उक्त प्रकरण में यह (जगत), मैं, तुम और वह यों उत्पन्न हुई भ्रान्ति इस प्रकार शांत होती है,
यह बात अनेक श्लोकों से दर्शाई गई है । उपशान्तिप्रकरण के सुननेपर यह संसार
जीवन्मुक्तिक्रम से क्षीण होता हुआ अंशतः अवशिष्ट रहता हे । जैसे जीर्णशीर्ण चित्रलिखित
सेना कुछ कुछ दिखाई देती है, वैसे ही जिसका भ्रमपूर्णं स्वरूप शान्त हो गया हे ऐसी यह
संसृति शतांश शेष रह जाती है