Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, Verses 3–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 17, verses 3–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 3-12
संस्कृत श्लोक
त्वमेतया खण्डितया गुणलक्ष्म्या समाश्रितः ।
मनोमोहहरं वाक्यं वक्ष्यमाणमिदं श्रृणु ॥ ३ ॥
पुण्यकल्पद्रुमो यस्य फलभारानतः स्थितः ।
मुक्तये जायते जन्तोस्तस्येदं श्रोतुमुद्यमः ॥ ४ ॥
पावनानामुदाराणां परबोधैकदायिनाम् ।
वचसां भाजनं भूत्यै भव्यो भवति नाधमः ॥ ५ ॥
मोक्षोपायाभिधानेयं संहिता सारसंमिता ।
त्रिंशद्द्वे च सहस्राणि ज्ञाता निर्वाणदायिनी ॥ ६ ॥
दीपे यथा विनिद्रस्य ज्वलिते संप्रवर्तते ।
आलोकोऽनिच्छतोऽप्येवं निर्वाणमनया भवेत् ॥ ७ ॥
स्वयं ज्ञाता श्रुता वापि भ्रान्तिशान्त्यैकसौख्यदा ।
आप्रेक्ष्य वर्णिता सद्यो यथा स्वर्गतरङ्गिणी ॥ ८ ॥
यथा रज्ज्वामहिभ्रान्तिर्विनश्यत्यवलोकनात् ।
तथैतत्प्रेक्षणाच्छान्तिमेति संसारदुःखिता ॥ ९ ॥
युक्तियुक्तार्थवाक्यानि कल्पितानि पृथक्पृथक् ।
दृष्टान्तसारसूक्तानि चास्यां प्रकरणानि षट् ॥ १० ॥
वैराग्याख्यं प्रकरणं प्रथमं परिकीर्तितम् ।
विरागो वर्धते येन सेकेनेव मरौ तरुः ॥ ११ ॥
अनुबन्धेन सहितं दिष्टतत्त्वनिरूपणम् ।
सार्धं सहस्रं ग्रन्थस्य यस्मिन्हृदि विचारिते ।
प्रकाशाच्छुद्धतोदेति मणाविव सुमार्जिते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी मे उक्त गुणो के अभाव की शंका का निराकरण करते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, आप इन अखण्डित गुणगणों से परिपूर्णं है, अतएव आप आगे कहे
जानेवाले मन के अज्ञान के विनाशक इस वाक्य को सुनिए। जिसका फलों के भार से खूब लदा
हुआ पुण्यरूपी कल्पवृक्ष हे, उसी पुण्यात्मा जीव का मुक्ति के लिए इसे सुनने के लिए उद्यम
होता हे । उक्त गुणों से सम्पन्न पुरुष ही मुक्ति के लिए अति पवित्र अन्य को बोध देनेवाले
उदार वचनों का पात्र होता है, अधम पुरुष नहीं । मोक्ष के साधन का प्रतिपादन करनेवाली
और सारभूत अर्थ से परिपूर्ण अतएव मोक्षदायिनी इस संहिता में बत्तीस हजार श्लोक है। जैसे
गहरी नींद में सोये हुए पुरुष के सामने दिये के जलने पर यद्यपि सोये हुए पुरूष को प्रकाश की
अभिलाषा नहीं रहती तथापि प्रकाश होता है, वैसे ही इस संहिता के श्रवण से, इच्छा न होने
पर भी, मोक्ष का साधन ज्ञान अवश्य प्राप्त होता है । जैसे स्वयं दर्शन करके जानी गई और
दूसरे के मुख से सुनी गई श्रीगंगाजी विविध योनियों में भ्रमण के हेतुभूत पाप और ताप की
शान्ति द्वारा शीघ्र सुखप्रद होती है वैसे ही स्वयं परिशीलन करके जानी गई अथवा दूसरे के
मुख से सुनी गई यह संहिता अज्ञान के विनाश द्वारा शीघ्र सुखप्रद होती है । जैसे रस्सी के
अवलोकन से रस्सी में हुई सर्पभ्रान्ति नष्ट हो जाती है, वैसे ही इस संहिता के अवलोकन से
(परिशीलन से) संसारदुःख नष्ट हो जाता है। इस संहिता में युक्तिसंगत अर्थवाले वाक्यों से
परिपूर्ण, श्रेष्ठ-श्रेष्ठ दृष्टान्तों से भरी हुई आख्यायिकाओंसे युक्त तथा पृथक-पृथक् रचे
गये छः प्रकरण है । उनमें पहला प्रकरण वैराग्य नामक कहा गया है, जैसे निर्जल स्थान में भी
जल के सेक से वृक्ष बढ़ता है, वैसे ही उक्त वैराग्यप्रकरण से वैराग्य बढता है । डेढ़ हजार
श्लोकों से युक्त वेराग्यप्रकरण में निरूपण किया गया है । जिसके विचार करनेपर विषयों में
दोष का ज्ञान होने से हृदय में ऐसी शुद्धता उत्पन्न होती है जैसे कि मणि को सान में चढ़ानेपर
प्रकाश से उसमें स्वच्छता उत्पन्न होती है