Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 16, Verses 18–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 16, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 18-20
संस्कृत श्लोक
संतोषः साधुसङ्गश्च विचारोऽथ शमस्तथा ।
एत एव भवाम्भोधावुपायास्तरणे नृणाम् ॥ १८ ॥
संतोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ।
विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ॥ १९ ॥
चत्वार एते विमला उपाया भवभेदने ।
यैरभ्यस्तास्त उत्तीर्णा मोहवारिभवार्णवात् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण द्वारपालों की एक ही साथ प्रशंसा करने की इच्छा से पूर्वोक्त का अनुवाद करते हैं ।
सन्तोष, सत्संगति, विचार और शान्ति ये ही चार संसारसागर में मग्न हुए लोगों के तरने
के उपाय हैं । सन्तोष सम्पूर्ण लाभों में सर्वश्रेष्ठ लाभ है, सत्संगति परम गति है, विचार परम
ज्ञान है और शम परम सुख है अर्थात् सन्तोष के तुल्य कोई लाभ नहीं है, सत्संग के तुल्य कोई
गति नहीं है, आत्मविचार के समान ज्ञान नहीं है और शान्ति के तुल्य और सुख नहीं है । ये चार
संसार के समूल विनाश के लिए निर्मल उपाय हैं, इनका जिन्होंने खूब अभ्यास किया, वे
मोहरूपी जल से लबालब भरे हुए संसारसागर से तर गये