Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 16, Verses 1–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 16, verses 1–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 1-17
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विशेषेण महाबुद्धे संसारोत्तरणे नृणाम् ।
सर्वत्रोपकरोतीह साधुः साधुसमागमः ॥ १ ॥
साधुसङ्गतरोर्जातं विवेककुसुमं सितम् ।
रक्षन्ति ये महात्मानो भाजनं ते फलश्रियः ॥ २ ॥
शून्यमाकीर्णतामेति मृतिरप्युत्सवायते ।
आपत्संपदिवाभाति विद्वज्जनसमागमे ॥ ३ ॥
हिममापत्सरोजिन्या मोहनीहारमारुतः ।
जयत्येको जगत्यस्मिन्साधुः साधुसमागमः ॥ ४ ॥
परं विवर्धनं बुद्धेरज्ञानतरुशातनम् ।
समुत्सारणमाधीनां विद्धि साधुसमागमम् ॥ ५ ॥
विवेकः परमो दीपो जायते साधुसंगमात् ।
मनोहरोज्ज्वलो नूनमासेकादिव गुच्छकः ॥ ६ ॥
निरपायां निराबाधां निर्वृतिं नित्यपीवरीम् ।
अनुत्तमां प्रयच्छन्ति साधुसङ्गविभूतयः ॥ ७ ॥
अपि कष्टतरां प्राप्तैर्दशां विवशतां गतैः ।
मनागपि न संत्याज्या मानवैः साधुसंगतिः ॥ ८ ॥
साधुसंगतयो लोके सन्मार्गस्य च दीपिकाः ।
हार्दान्धकारहारिण्यो भासो ज्ञानविवस्वतः ॥ ९ ॥
यः स्नातः शीतसितया साधुसंगतिगङ्गया ।
किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ॥ १० ॥
नीरागाश्छिन्नसंदेहा गलितग्रन्थयोऽनघ ।
साधवो यदि विद्यन्ते किं तपस्तीर्थसंग्रहैः ॥ ११ ॥
विश्रान्तमनसो धन्याः प्रयत्नेन परेण हि ।
दरिद्रेणेव मणयः प्रेक्षणीया हि साधवः ॥ १२ ॥
सत्समागमसौन्दर्यशालिनी धीमतां मतिः ।
कमलेवाप्सरोवृन्दे सर्वदैव विराजते ॥ १३ ॥
तेनामलविचारस्य पदस्याग्रावचूलिता ।
प्रथिता येन धन्येन न त्यक्ता साधुसंगतिः ॥ १४ ॥
विच्छिन्नग्रन्थयस्तज्ज्ञाः साधवः सर्वसंमताः ।
सर्वोपायेन संसेव्यास्ते ह्युपाया भवाम्बुधौ ॥ १५ ॥
ते एते नरकाग्नीनां संशुष्केन्धनतां गताः ।
यैर्दृष्टा हेलया सन्तो नरकानलवारिदाः ॥ १६ ॥
दारिद्र्यं मरणं दुःखमित्यादिविषयो भ्रमः ।
संप्रशाम्यत्यशेषेण साधुसंगमभेषजैः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
साधुसमागमरूप चतुर्थ द्वारपाल का वर्णन कर रहे और चारों में से प्रत्येक के विषय में
किया गया प्रबल पुरुषप्रयत्न पुरूषार्थपद है, ऐसा दशति हुए श्रीवस्रिष्ठजी बोले :
हे महामते, इस लोक में श्रेष्ठ साधुसमागम मनुष्यों के संसारसागर से उत्तरण में विशेषरूप
से सब जगहों में (सम्पूर्ण अवस्थाओं में) उपकार करता हे । साधुसंगतिरूपी वृक्ष के उत्पन्न
हुए विवेकरूपी सफेद फूल की जो महात्मा रक्षा करते हैं, वे मोक्षफलरूप सम्पत्ति के भाजन
होते हैं। साधु पुरुषों का समागम होने पर आत्मीय जन और धन से शून्य दुःखपूर्ण स्थान धन
और जन से परिपूर्ण हो जाता है, मृत्यु भी उत्सव में परिणत हो जाती है और आपत्तियाँ
सम्पत्तियों की तरह मालूम होती है । इस संसार में आपत्तिरूपी कमलिनी के लिए हेमन्त
ऋतुरूप और मोहरूपी कुहरे के लिए वायुरूप केवल श्रेष्ठ साधुसमागम ही सर्वोत्कृष्ट है। हे
रामचन्द्रजी, आप साधुसमागम को बुद्धि को अत्यन्त बढ़ानेवाला, अज्ञानरूपी वृक्ष का उच्छेद
करनेवाला और मानसिक व्याथाओं को दूर करनेवाला जानिए । जैसे उद्यान को सींचने से
फल-फूलों के गुच्छे प्राप्त होते हैं, वैसे ही साधुसंगम से मनोहर और निर्मल विवेकरूपी परम
दीप उत्पन्न होता हे । साधुसंगतिरूपी विभूतियाँ नित्य बढ़नेवाले अविनाशी ओर बाध रहित
उत्तम सुख को देती हैं । कितनी ही बड़ी आपत्ति को प्राप्त क्यों न हो और कितनी ही बड़ी
पराधीनता को प्राप्त क्यो न हों फिर भी मनुष्यों को क्षणभर के लिए भी साधु संगति का त्याग
नहीं करना चाहिए । साधुसंगति सन्मार्ग की दीपक है और हृदयान्धकार को दूर करनेवाली
ज्ञानरूपी सूर्य की प्रभा है। जिसने शीतल और स्वच्छ साधुसंगतिरूपी गंगा में स्नान किया है,
उसको दानो से, तीर्थो से, तपस्याओं से ओर यज्ञों से क्या प्रयोजन है ? जिनके राग नष्ट हो
गये हैं, सन्देह कट चुके हैं एवं चिद्जड़ग्रन्थि नष्ट हो चुकी हैं, ऐसे साधु पुरुष यदि विद्यमान हैं,
तो तप और तीर्थ करने से क्या प्रयोजन है ? जैसे दरिद्र पुरुष मणियों को बड़े प्रेम से देखते हैं,
वैसे ही जिनका चित्त विश्रान्तिसुख से परिपूर्ण है, ऐसे धन्य साधु पुरुषों के बड़े प्रयत्न से दर्शन
करने चाहिए । जैसे अप्सराओं के समूह में विष्णु के समागम और अपनी सर्वोत्कृष्ट सुन्दरता
से युक्त लक्ष्मी शोभित होती है, वैसे ही जिन बुद्धिमान की मति सत्समागम रूप सौन्दर्य से
युक्त हे, वह भी सदा विराजमान रहती हे । जिस धन्य पुरुष ने साधुसंगति का परित्याग नहीं
किया, ब्रह्म की प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर रहे लोगों में ब्रह्म की प्रथम प्राप्ति से वह अपनी
शिरोभूषणता (सर्वोत्कृष्टता) प्रसिद्ध कर लेता है जिनकी अन्तःकरण और उसके धर्मों में
तादात्म्यसंसगध्यासरूप चिद्जड़- ग्रन्थि छिन्न-भिन्न हो गई है, उन ब्रह्मज्ञानी एवं सर्वसम्मत
साधुओं की दान, सम्मान, सेवा आदि सब प्रयत्नों से सेवा करनी चाहिए, क्योंकि वे लोग
भवसागर में डूबे हुए लोगों के तारण के उपाय हैं । जिन लोगों ने नरकरूपी अग्नि को बुझाने के
लिए जल बरसानेवाले मेघरूप सन्त-महात्माओं को तिरस्कार की दृष्टि से देखा, वे लोग
नरकरूपी अग्नि की सूखी लकड़ी बन गये, अर्थात् सूखी लकड़ियों की नाई नरकाग्नि ने उन्हें
जला डाला । सज्जनसंगतिरूपी औषधियों से दरिद्रता, मृत्यु, दुःख आदि विषयक सन्निपात
समूल नष्ट हो जाता है
सर्ग सन्दर्भ
पन्द्रहववोँ सर्ग समाप्त सोलहवाँ सर्ग साधुसंगतिरूप चतुर्थ द्वारपाल का वर्णन तथा चारों में से प्रत्येक के सेवन में भी पुरुषार्थहेतुता का वर्णन ।