Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 15, Verses 18–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 15, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 18-20
संस्कृत श्लोक
नित्यं शीतलया राम कुलङ्कपरिभिन्नया ।
पुरुषः शुद्धया वृत्त्या भाति पूर्णतयेन्दुवत् ॥ १८ ॥
समतासुन्दरं वक्रं पुरुषस्यावलोकयन् ।
तोषमेति यथा लोको न तथा धनसंचयैः ॥ १९ ॥
समतया मतया गुणशालिनां पुरुषराडिह यः समलंकृतः ।
तममलं प्रणमन्ति नभश्चरा अपि महामुनयो रघुनन्दन ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
के संचय से सन्तोष को प्राप्त नहीं होता । हे रघुनन्दन, जो पुरुषश्रेष्ठ ङस लोक में
गुणशाली पुरुषों द्वारा प्रशंसित समता से अलंकृत हे, उसको आकाशचारी देवता ओर
महामुनि भी बड़े भक्तिभाव से प्रणाम करते हँ