Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 15
चौढहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवों सर्ग वैराग्यकल्पवृक्ष की छाया के समान सुखकर शीतल तीसरे द्वारपाल सन्तोष का वर्णन |
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- Verses 1–11क्रम प्राप्त तीसरे द्वारपाल सन्तोष का वर्णन करते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे शत्रुतापन…
- Verse 12सन्तोष के पूर्वोक्त लक्षण का अनुवाद कर अन्य लक्षण कहते हैँ । जो पुरूष अप्राप्त विषय की अभ…
- Verses 13–17मुखकान्ति की विशिष्टता भी उसका लक्षण है, ऐसा कहते हैं - सन्तोष से अत्यन्त तृप्त पूर्णचित्…
- Verses 18–20के संचय से सन्तोष को प्राप्त नहीं होता । हे रघुनन्दन, जो पुरुषश्रेष्ठ ङस लोक में गुणशाली…