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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 15, Verses 13–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 15, verses 13–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 13-17

संस्कृत श्लोक

संतुष्टिपरतृप्तस्य महतः पूर्णचेतसः । क्षीराब्धेरिव शुद्धस्य मुखे लक्ष्मीर्विराजते ॥ १३ ॥ पूर्णतामलमाश्रित्य स्वात्मन्येवात्मना स्वयम् । पौरुषेण प्रयत्नेन तृष्णां सर्वत्र वर्जयेत् ॥ १४ ॥ संतोषाऽमृतपूर्णस्य शान्तशीतलया धिया । स्वयं स्थैर्यं मनो याति शीतांशोरिव शाश्वतम् ॥ १५ ॥ संतोषपुष्टमनसं भृत्या इव महर्द्धयः । राजानमुपतिष्ठन्ति किंकरत्वमुपागताः ॥ १६ ॥ आत्मनैवात्मनि स्वस्थे संतुष्टे पुरुषे स्थिते । प्रशाम्यन्त्याधयः सर्वे प्रावृषीवाशु पांशवः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

मुखकान्ति की विशिष्टता भी उसका लक्षण है, ऐसा कहते हैं - सन्तोष से अत्यन्त तृप्त पूर्णचित्तवाले ओर क्षीरसागर के समान शुद्ध महापुरुष के मुखपर लक्ष्मी सदा विराजमान रहती हे । अपनी आत्मा में आत्मा से ही निरतिशयानन्दरूप पूर्णता का अवलम्बन कर पौरुष प्रयत्न से सम्पूर्ण विषयों की तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए । क्रोध ओर सन्ताप के हेतु के न रहने के कारण शान्त और शीतल बुद्धि से चन्द्रमा के समान सन्तोषरूप अमृत से पूर्ण मनुष्य का मन सदा स्वयं स्थिरता को प्राप्त होता हे । बड़ी बड़ी सम्पत्तियाँ, मृत्यु की तरह सन्तोष से जिसका मन परिपुष्ट है, ऐसे पुरुष के पास स्वयं प्राप्त होती हैं । यानी उसकी सेविकाएँ बन जाती है । जैसे वर्षऋतु में धूलिकण स्वयं शीघ्र शान्त हो जाते हैं, वैसे ही अपनी आत्मा से आत्मा में सन्तुष्ट स्वस्थ पुरुष में सम्पूर्ण मानसिक व्यथाएँ शान्त हो जाती हैँ