Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 15, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 15, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
नाभिवाञ्छत्यसंप्राप्तं प्राप्तं भुंक्ते यथाक्रमम् ।
यः सुसौम्यसमाचारः संतुष्ट इति कथ्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
सन्तोष के पूर्वोक्त लक्षण का अनुवाद कर अन्य लक्षण कहते हैँ ।
जो पुरूष अप्राप्त विषय की अभिलाषा नहीं करता, क्रमशः प्राप्त सुख ओर दुःख का भोग
करता हे जगत् को आनन्द देनेवाले सदाचार से युक्त वह पुरूष सन्तुष्ट कहा जाता हे