Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, Verses 11–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, verses 11–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 11-22
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्त्यनन्तविलासात्मा सर्वगः सर्वसंश्रयः ।
चिदाकाशोऽविनाशात्मा प्रदीपः सर्वजन्तुषु ॥ ११ ॥
स्पन्दास्पन्दसमाकारात्ततो विष्णुरजायत ।
स्यन्दमानरसापूरात्तरङ्गः सागरादिव ॥ १२ ॥
सुमेरुकर्णिकात्तस्य दिग्दलाद्धृदयाम्बुजात् ।
तारकाकेसरवतः परमेष्ठी व्यजायत ॥ १३ ॥
वेदवेदार्थविद्देवमुनिमूण्डलमण्डितः ।
सोऽसृजत्सकल सग विकल्पौघं यथा मनः ॥ १४ ॥
जम्बूद्वूपिस्य कोणेऽखिरवर्षे भारतनामनि ।
ससज जनसर्गौधं ह्याधिव्याधिपरिप्लुतम् ॥ १५ ॥
भावाभावविषण्णाङ्गमुत्पातध्वसतत्परम् ।
सर्गेऽस्मिन्भूतजातीना नानाव्यसनसकुलम् ॥ १६ ॥
जनस्यैतस्य दुःखं तद्दृष्ट्वा सकललोककृत् ।
जगाम करुणामीशः पुत्रदुःखात्पिता यथा ॥ १७ ॥
क एतेषां हताशानां दुःखस्यान्तो हतायुषाम् ।
स्यादिति क्षणमेकाग्रं चिन्तयामास भूतये ॥ १८ ॥
इति संचिन्त्य भगवान्ससर्ज स्वयमीश्वरः ।
तपो धर्म च दानं च सत्यं तीर्थानि चैव हि ॥ १९ ॥
एतत्सृष्ट्वा पुनदवाश्चन्तयामास भूतकृत् ।
पुंसां नानेन सर्गस्य दुःखस्यान्त इति स्वयम् ॥ २० ॥
निर्वाणं नाम परमं सुखं येन पुनर्जनः ।
न जायते न म्रियते तज्ज्ञानादेव लभ्यते ॥ २१ ॥
संसारोत्तरणे जन्तोरुपायो ज्ञानमेव हि ।
तपो दानं तथा तीर्थमनुपायाः प्रकीर्तिताः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, घट-घट व्यापी, सबका आधार, अखण्ड चेतन,
अविनाशी, सब प्राणियों में प्रकाशकरूप से स्थित एवं असीम मायिक विलासो का एकमात्र
अधिष्ठान परमात्मा हे । माया और माया के कार्यो के आविर्भाव ओर तिरोभाव मे सदा एकाकार
(निर्विकार) उस परमात्मा से विष्णु (सम्पूर्ण कार्यो में व्याप्त रहनेवाले ब्रह्माण्डरूप विराट्)
सूक्ष्मभूतों के क्रम से उत्पन्न हुए जैसे कि स्पन्दमान जल से परिपूर्ण निश्चलावस्था और
चंचलावस्था में अप्रच्युत जल-स्वभाव सागर से तरंगें उत्पन्न होती हैं । उस विराट् पुरुष के
हृदयरूपी कमल से परमेष्ठी की (चतुर्मुख ब्रह्मा की) उत्पत्ति हुई | सुवर्णाचल सुमेरु उस
कमल की कर्णिका है, दिशाएँ दल हैं ओर तारे केसर हैं । हे श्रीरघुकुलतिलक, जैसे कि मन
विविध विकल्पों की सृष्टि करता है वैसे ही वेद ओर वेदार्थ के महान् परिज्ञाता ब्रह्माजी ने
देवताओं ओर मुनियों की मण्डली के साथ सम्पूर्ण प्राणियों की सृष्टि आरम्भ की । उन्होने इस
जम्बूद्वीप के एक भाग इस भारतवर्षं में लाभ और हानि से दुःखी, जन्म-मरण-शील एवं
मानसिक ओर कायिक व्याधियोँ से पीडित विविध प्राणियों की सृष्टि की । प्राणियों की इस
सृष्टि मेँ विविध विषयभोगरूपी व्यसनों से पूर्ण लोगों का क्लेश देखकर सम्पूर्ण लोकों की
सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्मा को, जैसे पुत्र को दुःखी देखकर पिता को दया आती है वैसे ही,
बड़ी दया आई उन्होंने प्राणियों के कल्याण के लिए क्षणभर एकाग्रचित्त होकर विचार किया
कि इन अल्पायु बेचारे जीवों के दुःख का अन्त किस उपाय से होगा ? ऐसा विचार कर भगवान्
ब्रह्माजी ने स्वयं तप, धर्म, दान सत्य ओर तीर्थो की सृष्टि की । हे रघुवर, तप आदि की सृष्टि
कर श्रीब्रह्माजी ने पुनः स्वयं विचार किया कि सृष्टिप्रवाह में पड़े हुए लोगों के दुःख का तप
आदि से समूल विनाश नहीं हो सकता | निर्वाण (मोक्ष) परम सुख है, जिसके प्राप्त होने पर
जीवन तो फिर जन्म लेता है और न मरता है वह निर्वाण ज्ञान से ही प्राप्त होता हे । अतः जीव
के संसारसागर से पार होने का एकमात्र उपाय ज्ञान ही हे