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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, Verses 23–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, verses 23–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 23-39

संस्कृत श्लोक

तत्तावदुःखमोक्षार्थ जनस्यास्य हतात्मनः । प्रत्यग्रं तरणोपायमाशु प्रकटयाम्यहम् ॥ २३ ॥ इति संचिन्त्य भगवान्ब्रह्मा कमलसंस्थितः । मनसा परिसंकल्प्य मामुत्पादितवानिमम् ॥ २४ ॥ कुतोऽप्युत्पन्न एवाशु ततोऽहं समुपस्थितः । पितुस्तस्य पुनः शीघ्रमूर्मिरूर्मेरिवानघ ॥ २५ ॥ कमण्डलुधरो नाथः सकमण्डलुना मया । साक्षमालः साक्षमालं स प्रणम्याभिवादितः ॥ २६ ॥ एहि पुत्रेति मामुक्त्वा स स्वाब्जस्योत्तरे दले । शुक्लाश्च इव शीतांशु योजयामास पाणिना ॥ २७ ॥ मृगकृत्तिपरीधानो मृगकृत्तिनिजाम्बरम् । मामुवाच पिता ब्रह्मा सुहंसः सारसं यथा ॥ २८ ॥ मुहूर्तमात्रं ते पुत्र चेतो वानरचञ्चलम् । अज्ञानमभ्यास्रशतु शशः शशधरं यथा ॥ २९ ॥ इति तेनाशु शप्तः सन्विचारसमनन्तरम् । अहं विस्मृतवान्सर्वे स्वरूपममलं किल ॥ ३० ॥ अथाहं दीनता यातः स्थितोऽसंबुद्धया धिया । दुःखशोकाभिसंतप्तो जातो जन इवाधनः ॥ ३१ ॥ कष्टं संसारनामायं दोषः कथमिहागतः । इति चिन्तितवानन्तस्तूष्णीमेव व्यवस्थितः ॥ ३२ ॥ अथाभ्यधात्स मां तातः पुत्र किं दुःखवानसि । दुःखोपघातं मां पृच्छ सुखी नित्यं भविष्यसि ॥ ३३ ॥ ततः पृष्टः स भगवान्मया सकललोककृत् । हेमपद्मदलस्थेन संसारव्याधिभेषजम् ॥ ३४ ॥ कथं नाथ महादुःखमयः संसार आगतः । कथं च क्षीयते जन्तोरिति पृष्टेन तेन मे ॥ ३५ ॥ तज्ज्ञानं सुबहु प्रोक्तं यज्ज्ञात्वा पावनं परम् । अहं पितुरभिप्रायः किलाधिक इव स्थितः ॥ ३६ ॥ ततो विदितवेद्यं मां निजां प्रकृतिमास्थितम् । स उवाच जगत्कर्ता वक्ता सकलकारणम् ॥ ३७ ॥ शापेनाज्ञपदं नीत्वा पृच्छकस्त्वं मया कृतः । पुत्रास्य ज्ञानसारस्य समस्तजनसिद्धये ॥ ३८ ॥ इदानीं शान्तशापस्त्वं परं बोधमुपागतः । संस्थितोऽहमिवैकान्माऽकनक कनकादिवत् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

तप, दान और तीर्थ संसारतरण के लिए नन कर्मणा न प्रजया धनेन“ (न कर्म से, न पुत्रोत्पादन सरे ओर न धनोपार्जन से ही मुक्ति हो सकती है) और “प्लवा ह्येते अद्रढा यज्ञरूपाः“ (ये यज्ञ आदि कच्चे प्लव (छोटी डोगी) हैं, इनसे संसारमुक्ति नहीं हो सकती) इत्यादि श्रुतियों मे असाधन कहे गये हैं। इसलिए मैं इन दीन-हीन लोगों के दुःख के समूल विनाश के लिए नूतन (मजबूत) संसारसागरतरण का उपाय शीघ्र प्रकट करता हू । यों विचार कर कमल पर बैठे हुए भगवान्‌ ब्रह्माजी ने मन से संकल्प कर मुझे, जो तुम्हारे सामने बैठा हूँ, पैदा किया । पुण्यमय श्रीरामजी, जैसे एक तरंग से शीघ्र दूसरी तरंग होती है वैसे ही मैं भी अनिर्वचनीय मायावश ही उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होते ही तुरन्त पिताजी के समीप में उपस्थित हुआ । जिनके हाथ में कमण्डल एवं रुद्राक्ष माला शोभा पा रही थी, उन भगवान्‌ ब्रह्माजी को कमण्डल और रुद्राक्षमाला से युक्त मैने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया । मुझसे “हे पुत्र, यहाँ आओ” कहकर उन्होंने अपने आसनरूप कमल की ऊपरी पंखुड़ी में सफेद बादलपर चन्द्रमा के समान मुझे अपने हाथ से बैठाया । मेरे पितृदेव ब्रह्माजी ने मृगचर्म पहन रक्खा था, उन्हींके अनुरूप मैं भी मृगचर्मधारी था। जैसे सुन्दर हंस सारस से कहे वैसे मृगचर्मधारी पितृदेव ब्रह्मा ने मृगचर्मधारी मुझसे कहा : हे पुत्र, जैसे चन्द्रमा में कलंक प्रविष्ट होता है वैसे ही वानर के समान चंचल अज्ञान एक मुहूर्त के लिए तुम्हारे चित्त में प्रवेश करे । वत्स रामचन्द्रजी, यों शीघ्र ब्रह्माजी से अभिशप्त हुआ मैं उनके संकल्प के अनन्तर ही अपना सारा निर्मल स्वरूप भूल गया । तदुपरान्त मैं जैसे किसी धनीका धन हर लेने से वह दीन-हीन हो जाता है वैसे ही दीन-हीन हो गया, तत्त्वविज्ञान से रहित और दुःख-शोकसे आक्रान्त मैं दिनपर-दिन जीर्णशीर्ण होने लगा । बड़े दुःख की बात है कि यह महाक्लेशदायक संसार नामक दोष कहाँ से मुझको प्राप्त हो गया ऐसा विचार करता था और किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करता था। तदुपरान्त पूज्य ब्रह्माजी ने मुझसे कहा : पुत्र, तुम क्यों दुःखी हो ? इस दुःख के नाशक उपाय को मुझसे पूछो । तदुपरान्त तुम अवश्य नित्यसुखी होओगे। तत्पश्चात्‌ स्वर्णकमल की पँखुरी में बैठे हुए मैंने सम्पूर्ण लोकों के रचयिता श्रीब्रह्माजी से संसारदु-खकी औषधि पूछी । मैंने पूछा : भगवन्‌, यह महादुःखमय संसार जीव को कैसे प्राप्त हुआ और कैसे इसका विनाश होता हे यों मेरे द्वारा पूछे गये उन्होंने मुझको उस प्रचुर ज्ञान का उपदेश दिया, जिस परम पवित्र ज्ञान को जानकर मैं पिता के सर्वोत्कृष्ट तत्त्वज्ञान के समान परिपूर्णस्वभाव हो गया । तदुपरान्त जब कि मैंने ज्ञातव्य तत्त्व जान लिया था, अतएव मैं अपनी प्रकृति में स्थित हो गया था, तब जगत्‌ के निर्माता, सबके कारण ओर उपदेशक ब्रह्माजी ने मुझसे कहा : पुत्र, मैंने शाप द्वारा तुम्हं अज्ञानी बनाकर समस्त अधिकारी लोगों की ज्ञान सिद्धि के लिए इस सारभूत ज्ञान का जिज्ञासु बनाया । वत्स, अब तुम्हारा शाप शान्त हो गया हे, जैसे चिरकाल तक मल के संसर्ग से मानों सुवर्णं अभावता को प्राप्त हुआ सुवर्णं पुनः शोधन से पूर्वकालिक शुद्ध सुवर्ण रूपता को प्राप्त हो जाता हे, वैसे ही तुम्हारा ओपाधिक अज्ञान नष्ट हो गया है, अब उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त हुए तुम मेरी नाई अद्वितीय आत्मरूप हो गये हो