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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यथास्थितं ब्रह्मतत्त्वं सत्तानियतिरुच्यते । सा विनेतुर्विनेतृत्वं सा विनेयविनेयता ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार कर रहे महर्षि वसिष्ठजी आचरण करने के योग्य शुभ का ही निर्देश करते हैं । महाभाग, आप श्रेष्ठतम पुरुषों द्वारा सेवित अति सुन्दर उन शुभ वासनाओं का अनुसरण कर, शुभ वासना से सम्पन्न बुद्धि से परमार्थ वस्तु का (परब्रह्म का) साक्षात्कार कीजिए और तदन्तर शुभ वासनाओं के अनुसरण का भी त्यागकर परम सत्य में स्थित होइए ॥४ ३॥ नैौर्वौँ सर्ग समाप्त दसवाँ सर्ग ब्रह्माजी के ओर अपने जन्म का वर्णन एवं समस्त जनों की मुक्ति के लिए मेरा उपदेश है इसका ज्ञान की अवतरणिका के रूप में वर्णन । प्राक्तन पौरुष का ही नाम दैव है उस पर आधुनिक पौरुष से भले ही विजय प्राप्त हो जाय । नियति तो, जो वैराग्य प्रकरण में कृतान्त की पत्नी कही गई है, अजेय है क्योकि उसे श्रेष्ठ पुरुष भावी पदार्थो की अवश्यंभावरूप भवितव्यता ओर अप्रतिकार्यं (अजेय) कहते है - अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद्‌ यदि । तदा दुःखैर्न लिप्येरन्‌ नलरामयुधिष्ठिराः । अर्थात्‌ यदि अवश्य होनेवाली घटनाओं का प्रतीकार होता, तो नल, राम, युधिष्ठिर आदि दुःखी न होते । ऐसी परिस्थिति में पुरुष पर नियति का नियन्त्रण रहने के कारण पुरुष की स्वतन्त्रता कहाँ रही ? इस शंका का निवारण करने के लिए श्रीवस्रिष्ठजी ने कहा । हे रामचन्द्र, ब्रह्मतत्त्व सब जगह सच्चिदानन्दप्रकाशरूप से सबकी अनुकूलता तथा समतारूप से स्थित है । उससे सम्बन्ध रखनेवाली सम्पूर्ण पदोर्थों की सत्ता को ही नियति कहते हैं जिसका भविष्यत्‌ काल के सम्बन्ध से भवितव्यता शब्द से व्यवहार किया जाता है। और सत्ता सर्वत्र उक्त रूप से स्थित ब्रह्मतत्त्व है वही कारण और कार्य में क्रमशः नियामक और नियम्यरूप से रहती है । कारण है तो अवश्य कार्य होना चाहिए और कार्य है तो कारण अवश्य होना चाहिए, इस प्रकार का नियम नियति है । वह नियन्ता कारण आदि की नियन्तृता (कायदिनियामकता) है ओर नियम्य कार्य आदि की नियम्यता है । पूर्वकाल में नियत सत्ता कारणता है और पश्चात्‌काल में नियत सत्ता कार्यता है