Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, Verses 2–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 10, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
अतः पौरुषमाश्रित्य श्रेयसे नित्यबान्धवम् ।
एकाग्रं कुरु तच्चित्तं शृणु चोक्तमिदं मम ॥ २ ॥
अवान्तरनिपातीनि स्वारूढानि मनोरथम् ।
पौरुषेणेन्द्रियाण्याशु संयम्य समतां नय ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वे दोनों देश-काल से विशेषित सत्तारूप ही हैं, यह भाव है ।
नियति सर्वनुकूल ब्रह्मसत्तारूप है, अतः पौरुष की सफलता के लिए भी नियति अनुकूल
ही है, प्रतिकूल नहीं है, इस अभिप्राय से कथित चित्त को एकाग्र करने के उपाय के बोधक
वचन को कहते हैं।
इसलिए पौरुष का अवलम्बन कर श्रेय के लिए नित्य बन्धुरूप चित्त को एकाग्र करो, मेरे
इस कथन को सुनो | इन्द्रियों को सदा विषयों की वासना बनी रहती है और वे मुक्ति से रहित
ऐहिक और स्वर्ग आदि सुख में आसक्त रहती हैं, अत: जैसे वे विषय की वासना न करें वैसे
प्रयत्न से इन्द्रियों को शीघ्र अपने वश में कर मन को सम कीजिए