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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, Verses 6–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, verses 6–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 6-12

संस्कृत श्लोक

बालो रामस्त्वनीकेषु न जानाति बलाबलम् । अन्तःपुरादृते दृष्टा नानेनान्या रणावनिः ॥ ६ ॥ न शस्त्रैः परमैर्युक्तो न च युद्धविशारदः । नवास्त्रैः शूरकोटीनां तज्ज्ञः समरभूमिषु ॥ ७ ॥ केवलं पुष्पखण्डेषु नगरोपवनेषु च । उद्यानवनकुञ्जेषु सदैव परिशीलनम् ॥ ८ ॥ विहर्तुमेष जानाति सह राजकुमारकैः । कीर्णपुष्पोपहारासु स्वकास्वजिरभूमिषु ॥ ९ ॥ अद्य त्वतितरां ब्रह्मन्मम भाग्यविपर्ययात् । हिमेनेव हि पद्माभः संपन्नो हरिणः कृशः ॥ १० ॥ नात्तुमन्नानि शक्नोति न विहर्तुं गृहावनिम् । अन्तःखेदपरीतात्मा तूष्णीं तिष्ठति केवलम् ॥ ११ ॥ सदारः सहभृत्योऽहं तत्कृते मुनिनायक । शरदीव पयोवाहो नूनं निःसारतां गतः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीराम बालक है, युद्ध से नितान्त अनभिज्ञ है और सेना का बलाबल नहीं जानता । इसने अन्तःपुर में क्रीडा के लिए कल्पित संग्राम छोडकर अन्य रणभूमि नहीं देखी है । न यह उत्तम शस्त्रो से युक्त है, न उत्तम अस्त्रो से युक्त है और न युद्धविद्या में निपुण ही हे । समरभूमि में असंख्य शूर-वीरों से कैसे युद्ध करना चाहिए, यह भी इसे ज्ञात नहीं है, युद्धनिपुणता तो दूर रही । केवल यह राजकुमारों के साथ पुष्पों से सुशोभित नगरोपवनों में, उद्यान के कुज मे परिभ्रमण करना तथा भाँति-भाँति के पुष्पों से व्याप्त अपने महल के आँगन में क्रीडा करना जानता हे । आजकल तो मेरे दुर्भाग्य से हिमसे कमल के समान कमलवदन श्रीराम अत्यन्त कृश और पीला हो गया है । वह न अन्न खा सकता है, न घर में घूम- फिर सकता हे | हृदयगत दुःख से व्याकुल होकर चुपचाप बैठा रहता हे । मुनिश्रेष्ठ, उसके कारण मैं, मेरी रानियाँ, मेरे सेवकवर्ग सबके सब शरत्काल के मेघ के समान निःसार हो गये हें