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Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 29

अद्राईसर्वं सर्ग समाप्त उनतीसवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्रजी का दोषदर्शन से सम्पूर्णं पदार्थों में स्ववैराग्यवर्णन एवं चित्त की शांति के लिए तत्त्वोपदेश की प्रार्थना ।

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  1. Verses 1–6श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार दोषदर्शन से अपने चित्त मे तत्वज्ञानजनक वैराग्य दशति हैं। श्रीरा…
  2. Verses 7–13शान्ति के सिवा दूसरा कोई भी सुखका साधन नहीं है, ऐसा कहते हैं। पूज्यवर, यह संसार सुखरहित औ…
  3. Verse 14तत्त्वज्ञ पुरुष भी तो विषयों का भोग करते हुए सुखी आदि देखे जाते हैं, फिर उनमें कौन सी विश…
  4. Verse 15अतः सम्पूर्णदुःखो का मूलोच्छेदक होने के कारण ज्ञानी होना ही परम पुरुषार्थ है, अत: ज्ञानोप…
  5. Verses 16–22शीघ्र उपदेश देने के लिए अपने मे अतिशय दुःख की असहिष्णुता और वैराग्य में उत्कण्ठा दिखलाते…
  6. Verse 23अभी तुम बालक हो, इसलिए तुममे शम, दम आदि की दढता नहीं है । यदि तुम्हे हमने तत्त्वज्ञान का…