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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, Verses 7–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, verses 7–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 7- 13

संस्कृत श्लोक

अनित्यश्चासुखो लोकस्तृष्णा तात दुरुद्वहा । चापलोपहतं चेतः कथं यास्यामि निर्वृतिम् ॥ ७ ॥ नाभिनन्दामि मरणं नाभिनन्दामि जीवितम् । यथा तिष्ठामि तिष्ठामि तथैव विगतज्वरम् ॥ ८ ॥ किं मे राज्येन किं भोगैः किमर्थेन किमीहितैः । अहंकारवशादेतत्स एव गलितो मम ॥ ९ ॥ जन्मावलिवरत्रायामिन्द्रियग्रन्थयो दृढाः । ये बद्धास्तद्विमोक्षार्थं यतन्ते ये त उत्तमाः ॥ १० ॥ मथितं मानिनीलोकैर्मनो मकरकेतुना । कोमलं खुरनिष्पेषैः कमलं करिणा यथा ॥ ११ ॥ अद्य चेत्स्वच्छया बुद्ध्या मुनीन्द्र न चिकित्स्यते । भूयश्चित्तचिकित्सायास्तत्किलावसरः कुतः ॥ १२ ॥ विषं विषयवैषम्यं न विषं विषमुच्यते । जन्मान्तरघ्ना विषया एकदेहहरं विषम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

शान्ति के सिवा दूसरा कोई भी सुखका साधन नहीं है, ऐसा कहते हैं। पूज्यवर, यह संसार सुखरहित और विनाशी है, तृष्णा (विषयवासना) बड़ी तीव्र है और चित्त की चंचलता की कोई सीमा ही नहीं है, उससे शान्तिलाभ की आशा दुराशा ही हे, मैं कैसे निवृत्तिलाभ करूँगा, यही मैं सदा विचार करता हूँ । न मैं मृत्यु का अभिनन्दन करता हूँ और न जीवन का ही अभिनन्दन करता हूँ । जिस अवस्था में स्थित होने से मेँ लोकसन्ताप से निर्मुक्त हो जाऊँ, उसी अवस्था का मैं अवलम्बन करना चाहता हूँ वह चाहे जीवनावस्था मेँ प्राप्त हो, चाहे मरने के पश्चात्‌ जब कभी हो, उसके लिए में व्यग्र नहीं हू । राज्य से मुञ्चे क्या करना है, भोग से मेरा कौन प्रयोजन सिद्ध होगा, धन से मुझे क्या मतलब है, किसी प्रकार की चेष्टा से भी मेरा कोई प्रयोजन नहीं हे । अहंकार वश इनकी उत्पत्ति होती है, मेरा वह अहंकार ही नष्ट हो गया है । इन्द्रियों का विषयों की आसक्ति से मुक्त होना बड़ा कठिन है, अतएव इन्द्र्यो ठहरी कभी न सुलञ्जनेवाली दृढ ग्रन्थियाँ । उन ग्रन्थियों द्वारा जन्म की पंक्ति रूपी चमड़े की रस्सी में बधि गये जीवों में से जो लोग उससे छुटकारा पाने के लिए यत्न करते हैं, वे ही श्रेष्ठ पुरुष हे । जैसे हाथी अपने विशाल पैर के प्रहार से कमल को कुचल डालता है । वैसे ही कामदेव ने रमणियों द्वारा कोमल मन को मथ डाला है, नष्ट कर दिया है । मुनीश्वर यदि इस बाल्यावस्था में निर्मल बुद्धि से चित्त की चिकित्सा नहीं की गई, तो फिर चित्त की चिकित्सा का अवसर कब आयेगा ? क्योकि जब तक भलीभाँति जड न जमी हो तभी तक छोटा-सा वृक्ष उखाडा जा सकता, जब वह बद्धमूल हो जाता है, तब तो उसे उखाडना बड़ा कठिन हो जाता र काँटेदार जंगली पेड है । है, ऐसी लोकोक्ति है कुटिल विषय ही विष है, प्रसिद्ध विष विष नहीं है, क्योकि विष एक ही देह का अर्थात्‌ जिस देह से उसका सम्बन्ध होता है, उसी का विनाश करता है मगर विषय तो अन्य जन्मों मेँ भी देह को मृत्यु के मुँह में डालते हैँ