Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, Verses 16–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, verses 16–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 16-22
संस्कृत श्लोक
वासनाजालवलिता दुःखकण्टकसंकुला ।
निपातोत्पातबहुला भीमरूपाऽज्ञताटवी ॥ १६ ॥
क्रकचाग्रविनिष्पेषं सोढुं शक्नोम्यहं मुने ।
संसारव्यवहारोत्थं नाशाविषयवैशसम् ॥ १७ ॥
इदं नास्तीदमस्तीति व्यवहाराञ्जनभ्रमः ।
धुनोतीदं चलं चेतो रजोराशिमिवानिलः ॥ १८ ॥
तृष्णातन्तुलवप्रोतं जीवसंचयमौक्तिकम् ।
चिदच्छाङ्गतया नित्यं विकसच्चित्तनायकम् ॥ १९ ॥
संसारहारमरतिः कालव्यालविभूषणम् ।
त्रोटयाम्यहमक्रूरं वागुरामिव केसरी ॥ २० ॥
नीहारं हृदयाटव्यां मनस्तिमिरमाशु मे ।
केन विज्ञानदीपेन भिन्धि तत्त्वविदांवर ॥ २१ ॥
विद्यन्त एवेह न ते महात्मन् दुराधयो न क्षयमाप्नुवन्ति ।
ये सङ्गमेनोत्तममानसानां निशातमांसीव निशाकरेण ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
शीघ्र उपदेश देने के लिए अपने मे अतिशय दुःख की असहिष्णुता और वैराग्य में उत्कण्ठा
दिखलाते हैं ।
अज्ञता भीषण अरण्य के सदृश हैं, जैसे अरण्य में मृगों को फँसाने के लिए जाल बिछे रहते हैं, चारो
ओर कोटि बिखरे रहते हैं, जगह-जगह ऊँची-नीची भूमि रहती है, वैसे ही अज्ञता भी विषयवासनारूपी
जालों से परिवेष्टित है, दुःखरूपी कण्टको से आकीर्ण है और सम्पत्ति-विपत्ति से या स्वर्गनरकपरम्परा
से पूर्ण है, इसलिए उससे मैं शीघ्र मुक्त होना चाहता हूँ। मुनिवर, यदि कोई मुझे आरे से चीरे, तो मेँ आरे
के दाँतों की रगड़ सहने के लिए समर्थ हूँ, लेकिन सांसारिक व्यवहार से उत्पन्न एवं आशा और विषयों
से हुए संघर्ष को मेँ सहने के लिए समर्थ नहीं हूँ । यह अभीष्ट है, यह सोचकर उसके निवारण में और यह
इष्ट है, यह समझकर उसके सम्पादन में प्रवृत्ति-निवृत्तिव्यवहाररूप अविद्यारूप अंजन से उत्पन्न
भ्रान्ति स्वभावतः चंचल चित्त को इस प्रकार कँपा डालती है जैसे वायु दीपक की लूर को कँपाती है।
जीवसमूहरूपी मोती तृष्णारूपी अत्यन्त सूक्ष्म धागे में पिरोये गये हैं, साक्षीरूप चैतन्य के सम्बन्ध से
एवं तैजस होने के कारण अत्यन्त देदीप्यमान मन ही उस माला में प्रधान (नायक) मणि है । वैराग्य
आदि से सम्पन्न मैं जैसे रोषपूर्ण सिंह जाल को तोड़ डालता है, वैसे ही कालरूपी किटके आभूषण इस
संसाररूपी हार को आपके उपदेश से उत्पन्न ज्ञान से-क्रोध, हिंसा आदि उग्र उपायों के बिना तोड़ता
हूँ। तत््वज्ञशिरोमणे, हृदयकमल ही दुष्प्रवेश होने के कारण अरण्य है, उसमें शीत और आवरण का हेतु
होने के कारण कुहरे के तुल्य और उसमें आत्मतत्व के अन्वेषण के लिए प्रवृत्त हुए मन के अन्धकार की
नाई विवेकरूपी नेत्र को बन्दकर देनेवाले अज्ञान को सुखकर उपदेशरूपी सूर्य से नष्ट कर दीजिये ।
महात्मन्, जैसे चन्द्रमा से रात्रि का अन्धकार नष्ट होता है, वैसे ही उत्तम पुरुषों की संगति से प्राप्त
उपदेश से जिनका विनाश नहीं होता, ऐसी दुष्ट मानसिक चिंताएँ इस जगतीतल में हँ ही नहीं अर्थात्
जैसे चन्द्रमा रात्रि के अन्धकार को नष्ट कर देता है, वैसे ही महात्मा पुरुषों की संगति से प्राप्त उपदेश
भी सम्पूर्ण क्लेशो को नष्ट कर देता हे