Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 29, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलम्बाम्बुवद्भङ्गुरं भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चलाः ।
लोलायौवनलालनाजलरयश्चेत्याकलय्य द्रुतं मुद्रैवाद्य दृढार्पिता ननु मया चित्ते चिरं शान्तये ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अभी तुम बालक हो, इसलिए तुममे शम, दम आदि की दढता नहीं है । यदि तुम्हे हमने तत्त्वज्ञान
का उपदेश दे भी दिया, तो वह फलीभूत नहीं होगा, ऐसी शंका की निवृत्ति के लिए श्रीरामचन्द्रजी अपने
म शम आदि की दृढ़ता दिखलाते हैं।
आयु वायु से टकराये हुए मेघों के समूह से टपक रहे जल के समान भंगुर है, भोग बादलों में चमक
रही बिजली के समान चंचल हैं और यौवन में होनेवाले चित्तविनोद जल के वेग के समान चपल हैं, ऐसा
शीघ्र विचार कर अर्थात् आयु, भोग, यौवन आदि में तृष्णा, चंचलता आदि दोषों से दुःख, नाश आदि
अनर्थ जानकर उनका त्यागकर मैंने इस बाल्यावस्था में भी सम्पूर्ण दोषों से रहित शान्ति के लिए अपने
हृदय के विषय में अटल अधिकार की मुहर दे रक्खी है