Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 26, Verses 33–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 26, verses 33–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 33-42
संस्कृत श्लोक
शिलाशैलकवप्रेषु साश्वभूतो दिवाकरः ।
वनपाषाणवन्नित्यमवशः परिचोद्यते ॥ ३३ ॥
धरागोलकमन्तस्थसुरासुरगणास्पदम् ।
वेष्ट्यते धिष्ण्यचक्रेण पक्वाक्षोटमिव त्वचा ॥ ३४ ॥
दिवि देवा भुवि नराः पातालेषु च भोगिनः ।
कल्पिताः कल्पमात्रेण नीयन्ते जर्जरां दशाम् ॥ ३५ ॥
कामश्च जगदीशानरणलब्धपराक्रमः ।
अक्रमेणैव विक्रान्तो लोकमाक्रम्य वल्गति ॥ ३६ ॥
वसन्तो मत्तमातङ्गो मदैः कुसुमवर्षणैः ।
आमोदितककुप्चक्रश्चेतो नयति चापलम् ॥ ३७ ॥
अनुरक्ताङ्गनालोललोचनालोकिताकृति ।
स्वस्थीकर्तुं मनः शक्तो न विवेको महानपि ॥ ३८ ॥
परोपकारकारिण्या परार्तिपरितप्तया ।
बुद्ध एव सुखी मन्ये स्वात्मशीतलया धिया ॥ ३९ ॥
उत्पन्नध्वंसिनः कालवडवानलपातिनः ।
संख्यातुं केन शक्यन्ते कल्लोला जीविताम्बुधौ ॥ ४० ॥
सर्व एव नरा मोहाद्दुराशापाशपाशिनः ।
दोषगुल्मकसारङ्गा विशीर्णा जन्मजङ्गले ।
संक्षीयते जगति जन्मपरम्परासु लोकस्य तैरिह कुकर्मभिरायुरेतत् ॥ ४१ ॥
आकाशपादपलताकृतपाशकल्पं येषां फलं नहि विचारविदोऽपि विद्मः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी सर्वनाशकता का उपपादन करने के लिए निरंकुश स्वतन्त्रता कहते है।
जैसे पर्वत शिखर से वेगपूर्वक बहता हुआ जल गोल पत्थरों को नीचे की ओर ले जाता है, वैसे ही
अवश (=) रथभूत सूर्य को ईश्वर चट्टान, पर्वत और परिखाओं में हाँकता हे । जैसे पका हुआ अखरोट
काफल कठिन छिलके से घिरा रहता है, वैसे ही वह मध्य में स्थित देवता, असुर आदिका निवास पृथ्वीरूप
गेंद को देवताओं के निवासभूत ज्योतिश्चक्र से चारों ओर से व्याप्त किये हुए हे । स्वर्ग में देवता, भूलोक
में मनुष्य ओर पाताल में सर्पो की उसीने कल्पना कर रक्खी है, वह जब इच्छा होती है, तभी उन्हें जीर्ण-
शीर्ण दशा को प्राप्त करा देता हे । भाव यह कि इस जगत् का अत्यन्त पराधीन होना बड़ा भारी दोष है,
ऐसे अन्याधीन जगत् में आस्था करना मूर्खता ही है जगत् के अधिपति के साथ हुए रण मेँ विजयी अतएव
पराक्रम पूर्ण कामदेव अनुचित रूप से जगत् को अपने वश में कर अपना प्रभाव दिखा रहा हे । जैसे मत्त
गजराच मद से चारों ओर दिशाओं को सुगन्धित करता हे, वैसे ही वसन्तऋतु पुष्पवृष्टि द्वारा चारों ओर
दिशाओं को सुगन्धित कर चित्त को चंचल कर देती हे । अनुरागयुक्त महिलाओं के चंचल लोचना के कटाक्ष
विक्षेप के लक्ष्य बने हुए मन को महान् विवेक भी स्वस्थ नहीं कर सकता | दूसरों का उपकार करनेवाली,
दूसरों के दुःख से अति सन्तप्त ओर अपनी आत्मा को शान्ति देनेवाली शीतल बुद्धि से युक्त ज्ञानी पुरुष
ही सुखी है, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है । उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले कालरूपी बड़वाग्नि के मुँह में गिरनेवाले
जीवनरूपी सागर के तरंग के समान पदार्थों को कौन गिन सकता है ? जैसे सागर में उत्पन्न होकर बड़वाग्नि
के मुँह में गिरकर नष्ट होनेवाले अनेक कल्लोलो को कोई गिन नहीं सकता वैसे ही संसार में उत्पन्न होकर
काल के मुँह में गिरनेवाले असंख्य जीवों को गिन सकने की किसमें शक्ति है ? दोषरूपी झाड़ियों में स्थित
मृगो या पक्षियों के तुल्य सभी मनुष्य अज्ञान से दुराशारूपी जाल में वैधकर जन्मरूपी जंगल में विनष्ट
हो गये हैं अर्थात् जैसे झाड़ियों में बैठे हुए मृग या पक्षी स्वाद लोलुपता के कारण अज्ञान से जाल में फँस
कर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही दोषपूर्ण मनुष्य अज्ञान से दुराशाबद्ध होकर जन्मरूपी जंगल में नष्ट हो जाते
हैं। इन संसारी लोगों की आयु विविध जन्मों मे पूर्वोक्त दोषों से होनेवाले कुकर्मों से (काम्य और निषिद्ध
कर्मो से) नष्ट हो जाती है। उनका फल जो स्वर्ग, नरक आदि है वह आकाश में वृक्ष हो और उस वृक्ष में
लता भी हो, उस लता से गले में फाँसी देकर मनुष्य लटका दिया जाय, उसके समान अन्त में पतन
करानेवाला ही है। उसकी निवृत्ति के लिए उपाय करना तो दूर रहा, परन्तु उसका विचार करनेवाले लोग
भी हमें नहीं दिखलाई देते