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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 26, Verses 7–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 26, verses 7–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 7-32

संस्कृत श्लोक

यमो निर्घृणराजेन्द्रो नार्तं नामानुकम्पते । सर्वभूतदयोदारो जनो दुर्लभतां गतः ॥ ७ ॥ सर्वा एव मुने फल्गुविभवा भूतजातयः । दुःखायैव दुरन्ताय दारुणा भोगभूमयः ॥ ८ ॥ आयुरत्यन्तचपलं मृत्युरेकान्तनिष्ठुरः । तारुण्यं चातितरलं बाल्यं जडतया हृतम् ॥ ९ ॥ कलाकलङ्कितो लोको बन्धवो भवबन्धनम् । भोगा भवमहारोगास्तृष्णाश्च मृगतृष्णिकाः ॥ १० ॥ शत्रवश्चेन्द्रियाण्येव सत्यं यातमसत्यताम् । प्रहरत्यात्मनैवात्मा मनसैव मनो रिपुः ॥ ११ ॥ अहंकारः कलङ्काय बुद्धयः परिपेलवाः । क्रिया दुष्फलदायिन्यो लीलाः स्त्रीनिष्ठतां गताः ॥ १२ ॥ वाञ्छाविषयशालिन्यः सच्चमत्कृतयः क्षताः । नार्यो दोषपताकिन्यो रसा नीरसतां गताः ॥ १३ ॥ वस्त्ववस्तुतया ज्ञातं दत्तं चित्तमहंकृतौ । अभाववेधिता भावा भावान्तो नाधिगम्यते ॥ १४ ॥ तप्यते केवलं साधो मतिराकुलितान्तरा । रागरोगो विलसति विरागो नोपगच्छति ॥ १५ ॥ रजोगुणहता दृष्टिस्तमः संपरिवर्धते । न चाधिगम्यते सत्त्वं तत्त्वमत्यन्तदूरतः ॥ १६ ॥ स्थितिरस्थिरतां याता मृतिरागमनोन्मुखी । धृतिर्वैधुर्यमायाता रतिर्नित्यमवस्तुनि ॥ १७ ॥ मतिर्मान्द्येन मलिना पातैकपरमं वपुः । ज्वलतीव जरा देहे प्रतिस्फुरति दुष्कृतम् ॥ १८ ॥ यत्नेन याति युवता दूरे सज्जनसंगतिः । गतिर्न विद्यते काचित्क्वचिन्नोदेति सत्यता ॥ १९ ॥ मनो विमुह्यतीवान्तर्मुदिता दूरतां गता । नोज्ज्वला करुणोदेति दूरादायाति नीचता ॥ २० ॥ धीरताऽधीरतामेति पातोत्पातपरो जनः । सुलभो दुर्जनाश्लेषो दुर्लभः सत्समागमः ॥ २१ ॥ आगमापायिनो भावा भावना भवबन्धनी । नीयते केवलं क्वापि नित्यं भूतपरम्परा ॥ २२ ॥ दिशोऽपि हि न दृश्यन्ते देशोऽप्यन्यापदेशभाक् । शैला अपि विशीर्यन्ते कैवास्था मादृशे जने ॥ २३ ॥ अद्यते सत्तयापि द्यौर्भुऽवन चापि ऊयते । धरापि याति वैधुर्यं केवास्था मादृशे जने ॥ २४ ॥ शुष्यन्त्यपि समुद्राश्च शीर्यन्ते तारका अपि । सिद्धा अपि विनश्यन्ति कैवास्था मादृशे जने ॥ २५ ॥ दानवा अपि दीर्यन्ते ध्रुवोऽप्यध्रुवजीवितः । अमरा अपि मार्यन्ते कैवास्था मादृशे जने ॥ २६ ॥ शक्रोऽप्याक्रम्यते वक्रैर्यमोऽपि हि नियम्यते । वायुरप्येत्यवायुत्वं कैवास्था मादृशे जने ॥ २७ ॥ सोमोऽपि व्योमतां याति मार्तण्डोऽप्येति खण्डताम् । मग्नतामग्निरप्येति कैवास्था मादृशे जने ॥ २८ ॥ परमेष्ठ्यपि निष्ठावान्ह्रियते हीररप्यजः । भवोऽप्यभावमायाति कैवास्था मादृशे जने ॥ २९ ॥ कालः संकाल्यते येन नियतिश्चापि नीयते । खमप्यालीयतेऽनन्तं कैवास्था मादृशे जने ॥ ३० ॥ अश्राव्यावाच्यदुर्दर्शतत्त्वेनाज्ञातमूर्तिना । भुवनानि विडम्ब्यन्ते केनचिद्भ्रमदायिना ॥ ३१ ॥ अहंकारकलामेत्य सर्वत्रान्तरवासिना । न सोऽस्ति त्रिषु लोकेषु यस्तेनेह न बाध्यते ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनिवर, संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनमें किसीका भी ऐश्वर्य पूर्ण नहीं है, सभी तुच्छ एश्वर्य वाले है । जितने भी विषय हैं, वे सभी भयानक हैं । उनसे अनन्त दुःख की ही प्राप्ति होती हे । आयु अत्यन्त चंचल हे, उसके जाने में कुछ भी विलम्ब नहीं होता ओर बाल्यावस्था मोह में ही बीत जाती है । सभी संसारी पुरुष विषयों के अनुसन्धान से ही कलंकित (मलिनचित्त) है, बन्धु-बान्धव संसाररूप बन्ध के लिए रज्जुरूप हैँ । सभी भोग संसाररूपी महारोग हैं, अर्थात्‌ जैसे अपथ्यसेवन से रोग नष्ट नहीं होता, वैसे ही भोगों के सेवन से संसाररूपी महारोग बना रहता है, अतएव उन्हे मूर्तिमान महारोग ही समञ्जना चाहिये सुख आदि की तृष्णाएँ मृगतृष्णिका के अनुरूप हैं । इन्द्र्यो ही अपनी शत्रु हैं, सत्य, ज्ञान आदिरूप वस्तु (ब्रह्म) अज्ञानवश असत्यता (देहादिता) को प्राप्त हो गई है । बन्धन का हेतु होने से मन आत्मा का शत्रु है एवं मन में "अहम्‌" ऐसा अभिमान करने से मनोभूत हुआ उक्त आत्मा आत्मा को आत्मभूत मन से ही दुःखी करता है । अहंकार (अभिमानप्रधान अन्तःकरण) आत्मा के कलंक का कारण है, अर्थात्‌ स्वरूप को दूषित कर देता है, बुद्धिर्यो (अध्यवसायात्मक वृत्तियाँ) बड़ी मृदु हैं, आत्मनिष्ठा की दृढता से रहित हैं, क्रिया अर्थात्‌ शारीरिक प्रवृत्तियाँ क्लेशकारिणी हैँ । लीलाएँ (मानसिक चेष्टाएँ) स्त्री पर ही केन्द्रित हो गई हैं, अर्थात्‌ उनकी विषय केवल स्त्रियाँ ही हो गई हैं। वासनाओं के विषय ही लक्ष्य हो गये हैं याने विषयों की ओर ही वासनाएँ दौड़ती हैं । आत्मस्फूर्तिरूप चमत्कार नष्ट हो गये हैं, स्त्रियाँ दोषों की पताका के सदुश हो गई हैं और सम्पूर्ण विषय नीरस हो गये हैं मुनिवर, सत्‌ पदार्थ ब्रह्म कार्यकारण- संघातरूपसे (देह, इन्द्रिय आदि रूप से) जाना जाता है, अर्थात्‌ संसारी लोग देह, इन्द्रिय आदि को ही आत्मा समझते हैं, चित्त अहंकार में प्रविष्ट किया गया है अर्थात्‌ लोगों का चित्त अहंकार से परिपूर्ण है, जितने पदार्थ हैं वे नाश से ग्रस्त हैं (विनाशी हैँ) । उक्त अनित्य पदार्थों का जिसमें लय होता है, उस आत्मा को कोई नहीं जानता श्रेष्ठतम बुद्धि ने सभी के अन्तःकरणको व्याकुल कर रक्खा है, किसीका अन्तःकरण सुखी नहीं है, केवल दुःख ही दुःख छाया है, रागरूपी रोग दिन-दिन बढ़ रहा है, वैराग्य का कहीं पता नहीं है। आत्मदर्शनशक्ति रजोगुण से नष्ट हो गई है ओर तमोगुण बढ़ रहा है, सत्त्वगुण का कहीं पता नहीं है एवं तत्त्वपदार्थ अत्यन्त दूर है । जीवन अत्यन्त अस्थिर है, मृत्यु आने के लिए तत्पर ही है, धैर्य का सर्वथा विनाश हो गया है और लोगों का तुच्छ विषयों में अनुराग नित्य बढ़ता जा रहा है। मति मूर्खता से मलिन हो गई है, शरीर का अन्तिम परिणाम एकमात्र नाश ही है अर्थात्‌ उसको अवश्य नष्ट होना है, शरीर में बुढ़ापा मानों प्रकाशित हो रहा है और पाप खूब दमदमा रहा है | दिन-प्रतिदिन जवानी प्रयत्नपूर्वक भाग रही है, सत्संगति का कहीं पता नहीं है, जिससे दुःख से छुटकारा प्राप्त हो जाय, ऐसी कोई गति नहीं है और सत्यता का उदय तो किसी में भी नहीं दिखाई देता । अन्तःकरण मोहजाल से अत्यन्त आच्छादित-सा हो गया है, दूसरे को सुखी देखकर होनेवाले सन्तोष का कहीं पता ही नहीं है, उज्ज्वल करुणा का उदय कहीं नहीं होता और नीचता न मालूम कहाँ से चली आ रही है | धीरता अधीरता में परिणत हो गई है, सम्पूर्ण जीवों का जन्म ओर मरण या उर्ध्वगमन और अधोगमन ही एकमात्र काम है, दुर्जन का संग पद-पद पर अतिसुलभ है, सज्जन की संगति अतिदुर्लभ है। सम्पूर्ण पदार्थ उत्पत्ति-विनाशशील हैं और वासना पदार्थो के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती । वही संसार में बन्धन करनेवाली है। काल नित्य प्राणियों के झुण्ड के झुण्ड को न मालूम कहाँ ले जाता है। दिशाएँ भी, जिन्हें काल से हरे जाने का भय नहीं है, नहीं दिखाई देती, नष्ट हो जाती हैं, देश भी अदेश हो जाता है अर्थात्‌ नष्ट हो जाता है और पर्वत भी टूट जाते हैं, फिर मेरे सदृश जन्तु की स्थिरता में क्या विश्वास है ? सन्मात्रस्वभाववाला ईश्वर आकाश को भी खा जाता है, चौदहों भुवनों को नष्ट कर देता है और पृथिवी भी उसीसे नष्ट हो जाती है, फिर मेरे जैसे जीव की स्थिरता में क्या विश्वास है ? समुद्र भी सूख जाते हैं, तारे भी टूट पडते हैं और सिद्ध भी नष्ट हो जाते हैं, फिर मेरे जैसे जन की स्थिरता में क्या विश्वास है ? बड़े-बड़े पराक्रमी दैत्यों को भी ईश्वर नष्ट कर देता है, ध्रुव के जीवन का भी कोई निश्चय नहीं है और अमर भी (देवता भी) मारे जाते हैं, फिर मेरे जैसे जीव की स्थिरता में क्या विश्वास हो सकता है ? वह इन्द्र को भी अपने मुँह से चबा डालता है, यम को भी अपने कार्य से विरत कर देता है याने नष्ट कर देता है और उसीसे वायु भी अभाव को प्राप्त हो जाता है, फिर मेरे जैसे प्राणी में स्थिरता की क्‍या आशा ? चन्द्रमा भी शून्यता को (अभाव को) प्राप्त हो जाता है, सूर्य के भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं, और अग्नि भी भग्न हो जाती है अर्थात्‌ शान्त हो जाती है, फिर मेरे जैसे प्राणी की क्या आशा है ? ब्रह्मा की भी अवधि है अर्थात्‌ ब्रह्मा की भी समाप्ति का अवसर नियत है, अजन्मा विष्णु का भी संहार होता है और शिवजी भी नहीं रहते, फिर मेरे जैसे मनुष्य की स्थिरता की आशा केवल दुराशा ही है। काल का भी जो विनाश करता है, नियति को भी नष्ट कर डालता है, और अनन्तआकाश को नष्ट कर देता है, वह भला मुझे कहाँ छोड़ेगा, इस लिए मेरे जैसे जीवों की स्थिरता का कभी भी विश्वास नहीं हो सकता। जिसका कानों से श्रवण नहीं होता, वाणी से कथन नहीं होता और नेत्रों से दर्शन नहीं होता ऐसे अज्ञातस्वरूप एवं भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाले किसी सूक्ष्म तत्त्व से चौदहों भुवन अपनी आत्मा में माया द्वारा दिखलाये जा रहे हैं। अहंकारांश को प्राप्त होकर सबके मध्य में निवास करनेवाला वह तत्त्व तीनों लोकों में स्थित प्राणियों मेँ से जिसे नष्ट नहीं करता, ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं