Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 24
तेईसवाँ सर्ग समाप्त चोबीसवाँ सर्ग मृगया में कौतूहल करनेवाले राजकुमार के रूपक से अपनी प्रियतमा कालरात्रि से युक्त काल का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ, यह काल राजकुमार (४६) के अनुरूप हे । संसार में इसकी…
- Verses 2–4इस जीर्ण-शीर्ण जगत्रूपी वनराजि में दीन-हीन ओर अज्ञानी प्राणीरूपी मृगो का शिकार कर रहे इस…
- Verse 5चलने में बडी दक्ष अर्थात् शीघ्र चलनेवाली सब मातृगणो से युक्त ओर बाधिन के समान प्राणियों…
- Verses 6–7चंचल श्वेतकमल, नीलकमल ओर रक्तकमलों से परिवेष्ठित मधुर जल से युक्त विशाल पृथ्वी ही इसके हा…
- Verse 8ब्रह्माण्डों की माला को धारण करने के कारण तुम्बों से बनाई गई वीणा के समान सुन्दर रूप ओर ध…
- Verse 9सदा टंकार शब्द करनेवाला और लगातार दुःखरूपी बाणों को उगलनेवाला उसका संहार नाम का धनुष चारो…
- Verse 10ब्रह्मन्, इस काल से ५ परब्रह्म सूर्य, चन्द्र आदि को भी प्रकाशित करता हुआ प्रदीप्त होता ह…