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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 24, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 24, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

ज्ञध्वी करतले ज्ञथ्वी पानपात्री रसान्विता । कमलोत्पलकह्लारलोलजालकमालिता ॥ ६ ॥ विरावी विकटास्फोटो नृसिंहो भुजपञ्जरे । सटाविकटपीनांसः कृतः क्रीडाशकुन्तकः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

चंचल श्वेतकमल, नीलकमल ओर रक्तकमलों से परिवेष्ठित मधुर जल से युक्त विशाल पृथ्वी ही इसके हाथ में मधुर (०७) मद्य से पूर्ण विशाल पानपात्री (मद्य पीने का पात्र) है । गजनिवाले, भीषण ताल ठोंकनेवाले ओर केसरो से (गर्दन के बालों से) जिनका कन्धा ठका हुआ है वे नृसिंहदेव (विष्णु के अवतार) इसके भुजारूपी पिंजडे मेँ हिरण्यकशिपु आदि दानवो के हिंसारूपी क्रीडा के लिए बाज पक्षी बनाये गये हैं