Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 24, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 24, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अनुत्तमस्त्वधिकविलासपण्डितो भ्रमच्चलन्परिविलसन्विदारयन् ।
जरज्जगज्जनितविलोलमर्कटः परिस्फुरद्वपुरिह काल ईहते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, इस काल से
५ परब्रह्म सूर्य, चन्द्र आदि को भी प्रकाशित करता हुआ प्रदीप्त होता है अतः वह राजा कहलाता
है । काल उसकी पटरानीरूप अनादि माया से उत्पन्न हुआ है और जगत्-रूपी युवराज सम्पत्ति का
भोक्ता है अतः यह उक्त राजारूपी परब्रह्म का पुत्र-कुमार कहलाता है ।
भः कड़वा, तीखा एवं दही से युक्त वासी कलेवा द्राविड में प्रसिद्ध है |
२ मद्य को सुगंधित बनाने के लिए एवं उसको सुशोभित करने के लिए मद्यपात्र भी कमलों से
परिवेष्ठित होता ही है ।
&> यद्यपि उसका स्वरूप और शब्द औरों को भीषण प्रतीत होते हैं, तथापि काल उससे भी भयानक
है उसकी दृष्टि में वे मधुर ही हैं, यह दशनि के लिए वह सुन्दर रूप और ध्वनि से युक्त कहा गया है ।
बढ़कर विलास करनेमें प्रवीण कोई नहीं है, यह राजपुत्र रूपी काल स्वयं भी दौड़ता है और इसके
लक्ष्यभूत प्राणी भी निरन्तर दौड़ते रहते हैं फिर भी इसका लक्ष्य (निशाना) नहीं चूकता। यह सबको ही
दुःखरूपी बाणों से विदीर्ण करता रहता है । यह काल ही सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ लक्ष्यवेधी (निशानेबाज)
है। यह जीर्णं जगत् में बन्दर की भाँति चंचलवृत्तिवाले विषयलोलुप जनों को व्याकुल बनाता है और
स्वयं उक्त प्रकार से विराजमान रहकर मृगया का आनन्द लेता है