Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 24, Verses 2–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 24, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
अस्यैवाचरतो दीनैर्मुग्धैर्भूतमृगब्रजैः ।
आखेटकं जर्जरिते जगज्जङ्गलजालके ॥ २ ॥
एकदेशोल्लसच्चारुवडवानलपङ्कजा ।
क्रीडापुष्करिणी रम्या कल्पकालमहार्णवः ॥ ३ ॥
कटुतिक्ताम्लभूताद्यैः सदधिक्षीरसागरैः ।
तैरेव तैः पर्युषितैर्जगद्भिः कल्ववर्तनम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस जीर्ण-शीर्ण
जगत्रूपी वनराजि में दीन-हीन ओर अज्ञानी प्राणीरूपी मृगो का शिकार कर रहे इस राजकुमाररूपी
काल के लिए प्रलयकाल का महासागर क्रीडार्थं बनाई गई रमणीय बावड़ी है, जिसके एक भाग में
बड़वानलरूपी सुन्दर कमल लहलहा रहे हैं | दधिसागर, क्षीरसागर सहित तथा कड्वे, तीखे और खट्टे
विविध खादयो से पूर्ण सदा एकरूप से रहनेवाले चिरकाल से स्थित अनेक जगत् इस राजकुमाररूपी
काल के कलेवे (नाश्ते के पदार्थ) हैं (>)