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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verses 9–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 9 , 10

संस्कृत श्लोक

श्रीब्रह्मोवाच । गुरुं वाल्मीकिमत्राशु प्रार्थयस्व प्रयत्नतः । तेनेदं यत्समारब्धं रामायणमनिन्दितम् ॥ ९ ॥ तस्मिञ्छ्रुते नरो मोहात्समग्रात्संतरिष्यति । सेतुनेवाम्बुधेः पारमपारगुणशालिना ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

श्री ब्रह्माजी ने कहा : वत्स भरद्वाज, जो तुमने मुझसे पूछा है इस विषय में अपने गुरु श्रीवाल्मीकिजी के निकट जाकर उनसे प्रयत्न से विनयपूर्वक प्रार्थना करो। उन्होंने जिस अनिन्दित (निर्दोष) रामायण का आरम्भ किया है, उसी का श्रवण करने पर अधिकारी मनुष्य सम्पूर्ण मोह को (अनादि अविद्याजन्य अज्ञान को) पार कर जायेंगे। जैसे लोग महागुणशाली रामसेतु (& ) द्वारा महापापसागर को पार कर जाते हैं वैसे ही महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित उत्तररामायण के श्रवण से ही दुस्तर मोहसागर अर्थात्‌ इस संसारमहासागर को अनायास तर जायेंगे