Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verses 11–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्त्वा स भरद्वाजं परमेष्ठी मदाश्रमम् ।
अभ्यागच्छत्समं तेन भरद्वाजेन भूतकृत् ॥ ११ ॥
तूर्णं संपूजितो देवः सोऽर्घ्यपाद्यादिना मया ।
अवोचन्मां महासत्त्वः सर्वभूतहिते रतः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
वाल्मीकिजी
ने कहा : भगवन् ब्रह्मा भरद्वाज से यह कहकर उसके साथ मेरे आश्रम में आये। मैंने शीघ्र ही देवाधिदेव
(८) मूल में जो कथोपायशब्द आया है, उसका अर्थ सप्तकाण्डयुक्त पूर्वरामायण (बालकाण्ड,
अयोध्याकाण्ड इत्यादि क्रम से सात काण्डों से युक्त रामायण) है । यह अर्थ "जिस ग्रन्थ की कथा
में महर्षि वाल्मीकिजी ने धर्मतत्त्वज्ञान, धर्मानुष्ठान और ईश्वरप्रपत्ति का निर्वाणज्ञान के उपायरूप
से वर्णन किया है यह कथोपाय है इस व्युत्पत्ति के द्वारा लब्ध होता है । पहले सात काण्डों से युक्त
पूर्वरामायण का श्रवण और उसके अर्थ या उसके उद्देश्य का विचार किया जाता है । उससे शम, दम
आदि सिद्धि और सगुण ब्रह्म का आपाततः ज्ञान होता है तदनन्तर मनुष्य निर्गुण तत्व का अधिकारी
होता है । वैसे अधिकारी के लिए ही वेदान्तवेद्य परब्रह्मप्रतिपादक इस ग्रन्थ का उपदेश है ।
(& ) श्रीरामचन्द्रनिर्मित सेतु, जो सेतुबन्ध रामेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है । शास्त्र में लिखा है कि
रामसेतु का दर्शन करके जीव के ब्रह्महत्या आदि सब पाप छूट जाते हैं। "सेतु दृष्टवा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां
व्यपोहति ।” चूँकि रामसेतु सब पापों को छुड़ाता है, इसलिए वह महागुणशाली कहा गया है।
ब्रह्माजी की अभ्युत्थान, अर्घ्य, पाद्य आदि द्वारा पूजा की तदनन्तर सब प्राणियों के हितैषी अतः
सत््वगुणसम्पन्न ([=) ) ब्रह्माजी मुञ्जसे कहने लगे