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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

कथोपायान्विचार्यादौ मोक्षोपायानिमानथ । यो विचारयति प्राज्ञो न स भूयोऽभिजायते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

भाव यह है कि न अत्यन्त ज्ञानी और न अत्यन्त अज्ञानी इस शास्त्र का अधिकारी है, यह कहना ठीक है, किन्तु मैं कारागार में हथकड़ियों से बँधे हुए कैदी की नाई अनादिकाल से बद्ध होकर परवशता, परिच्छिन्नता, जन्म, जरा, मरण आदि दु:ख सागर में इवा हुआ हूँ, इस दुःख की आत्यान्तिक निवृत्ति का उपाय एकमात्र आत्मज्ञान ही है, क्योकि "तरति शोकमात्मवित्‌“ (आत्मा को जाननेवाला पुरुष ही दुःख से विमुक्त होता है।) यह श्रुति आत्मज्ञान ही मुक्ति का उपाय है, ऐसा कहती है । इसलिए मैं उस आत्मज्ञान का लाभ कर मुक्त होऊँ, इस प्रकार की उत्कट जिज्ञासा से युक्त जिसका निश्चय है, वह इस शास्त्र का अधिकारी है, ऐसे ही पुरुष को इस शास्त्र के श्रवण का फल मिलता है निष्कर्ष यह निकला कि अनेक पुण्यों से जिसके राग आदि दोष क्षीण हो गये हैं और विवेक से जिसे आत्मा की जिज्ञासा हुई है, ऐसे विशेषरूप से आत्मा को न जाननेवाले अज्ञानी का ही इस शास्त्र में अधिकार है। शका - जिसके राग आदि दोष नष्ट हो गये हैं, ऐसा त्रैवर्णिक इस योगवासिष्ठरूप शास्त्र में अधिकारी है, ऐसा यदि मानो, तो यह संन्यासपूर्वक वेदान्त श्रवण में ही अधिकारी है, ऐसा अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा, क्योकि पूर्वकाण्ड के (कर्मकाण्ड के) अनुष्ठान से चित्त के शुद्ध होने पर ही उत्तरकाण्ड में (वेदान्त में) अधिकार प्राप्त होता है, ऐसा (तमेतं वेदानुवचनेन" इत्यादि श्रुति से स्रिद्ध है। और जो त्रैवर्णिक नहीं है, उसका अधिकार भी इसमें नहीं हो सकता, क्योंकि “नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्‌” इत्यादि श्रुति से उसके अधिकार का निषेध किया गया है। इस परिस्थिति में इस शास्त्र का अधिकारी कैसे घुलभ होगा ? आकाश में, बहीः बहिःप्रज्ञ द्वारा भोग्य जाग्रत्‌ में, अंतः अन्तःप्रज्ञ द्वारा भोग्य स्वप्न में एवं मरण, मूर्च्छा आदि अवस्थाओं में जो स्थूल सूक्ष्म कारणों के अभिमानी-रूप से, भोक्ततृत्वरूप से, साक्षीरूप से और निष्प्रपंचपूर्णानन्दचिन्मात्रस्वभाव से नाना प्रकार का प्रतीत होता है, पर वस्तुतः चैतन्यस्वभाव ही है, उस सर्वात्मा परब्रह्म को नमस्कार है । अथवा कारणोपाधि में, कर्मबीज के उद्‌भवस्थान कार्योपाधि में, जीवन्मुक्तिदशा में, निरुपाधि स्वरूप में एवं माया ओर अन्तःकरण की वृत्तियों में जो ज्ञानस्वभाव प्रकाशित होता है, उस सर्वोपाधि शून्य परमात्मा को नमस्कार है । अथवा दिवि- प्रकाशस्वरूप तेज में, भूमौ-पृथिवी में, व्योन्मि-आकाश में, अन्त-अन्तरालस्थ जल और पवन में, बहिः बहिर्भूत अव्याकृत में तथा निरुपाधिक परमार्थरूप में जो अनुवृत्त होकर सन्मात्रस्वभाव परमात्मा भासता है, उस अवभासात्मक परमात्मा को नमस्कार है । अथवा बाहर तटस्थरूप को धारण कर पूज्य देवता आदि के रूप से देवलोक मेँ देह के मध्य में रहकर पूजकरूप से भूलोक में ओर क्रिया, फल, साधन आदि के रूप से अन्तराल में स्वरूप की अज्ञानावस्था में परिच्छिन्नरूप से अन्यथा प्रतीत होकर भी तत्त्वदृष्टि के उदित होने पर जो परिच्छेद रहित प्रतीत होता है, उस सर्वात्मा त्रिविधपरिच्छेदशून्य परमात्मा को नमस्कार है । अथवा ऊपर, नीचे, मध्य में, पूर्व आदि दिशाओं में, शरीर के भीतर, भूत ओर भविष्यत्‌ काल में जो अवभासात्मा मुझ तत्त्वज्ञानी को प्रतीत होता है, उस सम्पूर्ण प्रपंच के बाध के आश्रयभूत परमात्मा को नमस्कार है । समाधान - आपका कथन ठीक नहीं हे, क्योकि जैसे त्रैवर्णिकका त्रेताग्निसाध्य (आहवनीय, गार्हपत्य ओर दक्षिणाग्नि- इन तीन अग्नियों से साध्य) कर्म मेँ अधिकार होने पर भी जो अनाहिताग्नि (जिन्होंने अग्न्याधान नहीं किया है) हैं, ऐसे पुरुषों द्वारा अनुष्ठेय स्मार्त कर्म में भी अधिकार है ही, वैसे ही श्रौतज्ञान के अधिकारी का भी असंन्यासी मुमुक्षु पुरुषों के अधिकार के समान इस ग्रन्थ में भी अधिकार हे । ओर यह अधिकार तभी तक हे, जब तक अज्ञान रहता है, क्योकि यह योगवासिष्ठ शास्त्र स्मृति के समान वेदार्थ को ही विशद करता हे । कहा भी है। वेदवेद्यो परे पुलि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत्‌ साक्षाद्‌ रामायणात्मना ॥ अर्थात्‌ केवल वेदों से जानने योग्य दशस्थनन्दन परमपुरुष भगवान्‌ रामचन्द्रजी के आविर्भूत होने पर वाल्मीकि महर्षि द्वारा रामायण के रूप मे साक्षात्‌ वेद का ही आविर्भाव हुआ। उसमें श्रीरामचन्द्रजी की कथा द्वारा पूर्वरामायण में उत्तरकाण्डसहित छः काण्ड से कर्मकाण्ड का निरूपण किया है और इस उत्तररामायण में याने योगवाप्िष्ठ में छः प्रकरणों द्वारा ज्ञानकाण्ड का निरूपण किया है। इस परिस्थिति में यह निष्कर्ष निकला कि जैसे कुछ स्मार्त कर्मों में - त्रैवर्णिकों के साथ स्त्री शूद्र आदि का भी अधिकार देखा जाता है, वैसे ही इस ग्रन्थ के श्रवण में भी पुराणश्रवण के समान त्रैवर्णिक ओर अत्रैवर्णिकसाधारण मुमुक्षुओं का अधिकार है। इस अर्थ में प्रमाणधूत श्रावयेच्चतुरो वणान्‌ कृत्वा ब्राह्मणमग्रत:” (ब्राह्मण को मुख्य श्रोता बनाकर चारों वर्णो को (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन वारो वर्णो को) पुराण युनावे), “नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्‌” (वेद को न जाननेवाला उस बड़ी वस्तु को परमात्मा को- नहीं पा सकता), (तंव त्वौपनिषदं पुरूषं पृच्छामि“ (उस उपनिषदेकगम्य पुरुष के विषय में पूछता हूँ) इत्यादि वचनों का वेद को न जाननेवाले का श्रौत ज्ञान में अधिकार नहीं है, इसी अर्थ में तात्पर्य है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वेद को न जाननेवाले को अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं होता“ इस अर्थ में उनका तात्पर्य है। कुछ लोगों का अभिप्राय यह है कि वेदपूर्वक प्राप्त हुआ आत्मज्ञान प्रशस्त होता है, यही उन वाक्यो से प्राप्त होता है जो भी हो, परन्तु “स हि सर्वर्विजिज्ञास्य आत्म वर्णैस्तथाऽऽश्रमैः “ इत्यादि अनेक वचनो से ज्ञात होता है कि पुराण श्रवण से उत्पन्न साधारण ज्ञान में औरों का भी (त्रैवणिकितरों का भी) अधिकार है । अधिकार के सिद्ध होने पर श्रौत आत्मज्ञान में जैसे कर्मकाण्ड में प्रतिपादित कर्मो के अनुष्ठान से उत्पन्न चित्त की शुद्धि हेतु है, वैसे ही यहाँ पर भी पर्वरामायण में प्रदर्शित स्व-स्व वर्ण और आश्रम के कर्मो के अनुष्ठान से होनेवाली चित्त की शुद्धि जिज्ञासा के उत्पादन द्वारा हेतु है, यों पूर्व और उत्तररामायण में हेतु हेतुमद्वावसंगति का प्रदर्शन करते हुए सम्पूर्ण अनर्थ की निवृत्तिरूप अन्य प्रयोजन दिखलाते है । पहले जिसमें कथारूप उपाय है उस रामचरितवर्णनात्मक पूर्वरामायण का विचार कर जो मोक्ष के उपायभूत इन छः प्रकरणों का विचार करता है, वह बुद्धिमान्‌ इस संसार में पुनः जन्म आदि दुःख को प्राप्त नहीं होता