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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

वाल्मीकिरुवाच । अहं बद्धो विमुक्तः स्यामिति यस्यास्ति निश्चयः । नात्यन्तमज्ञो नोत ज्ञः सोऽस्मिञ्छास्त्रेऽधिकारवान् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

वाल्मीकिजी ने कहा : मैं इस संसाररूप कारागार में बद्ध (२) इस श्लोक के और भी अनेक अर्थ टीकाकारों ने किये हैं- जैसे पृथिवी पूर्वरूपं दौरुत्ततररूपम्‌” इस श्रुति में दर्शाया गया है, वैसे ही इस श्लोक में दिवि-ब्रह्माण्ड के सुवर्ण मय ऊपर के कपाल में, भूमौ - ब्रह्माण्ड के रजतमय नीचे के कपाल में, आकाश - उन दोनों के सन्धिभूत सूक्ष्म आकाश में और भीतर सूर्य, चन्द्र और अग्नि से भी जो अधिक प्रकाशित होता है, उस सब वस्तुओं के परमार्थस्वरूप अवभासात्मा परमात्मा को नमस्कार है । अथवा दिवि-द्योतनात्मक भूमानन्दरूप तुर्यस्वरूप में, भूमौ-दो अवस्थाओं की स्थूल-सूक्ष्म की उत्पत्तिभूमि में, आकाशे-अव्याकृतत हूँ, इससे मुझे मुक्त होना चाहिए, ऐसी जिसको मुक्ति की प्रबल इच्छा हुई है एवं जो अत्यन्त अज्ञानी नहीं है और जो अत्यन्त ज्ञानी भी नहीं है, वही इस शास्त्र के श्रवण में अधिकारी है