Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
अस्मिन्रामायणे रामकथोपायान्महाबलान् ।
एतांस्तु प्रथमं कृत्वा पुराहमरिमर्दन ॥ ४ ॥
शिष्यायास्मि विनीताय भरद्वाजाय धीमते ।
एकाग्रो दत्तवांस्तस्मै मणिमब्धिरिवार्थिने ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तात्पर्य यह है कि पूर्वरामायण में जिस मयादापुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचन्द्रजी की कथा का वर्णन
किया गया है, वह कथा ही ज्ञानाधिकार को प्राप्त करानेवाले धर्म-तत्त्वज्ञान, धर्म का अनुष्ठान और
ईश्वर में विश्वास के उपाय हेतु है अर्थात् सारी रामायण की कथा सुनने के बाद मनुष्य को धर्म का यथार्थ
ज्ञान होता है, फिर वह उसका अनुष्ठान करता है और अनुष्ठान से निर्मल चित्त होने पर ईश्वर में उसे
विश्वास होता है, इन तीनों के होने पर वह ब्रह्मज्ञान का अधिकारी होता है। अत: जिससे भगवान् की
कथा का सविस्तर वर्णन किया है, उस पूर्वरामायण का पहले खूब अभ्यास और परिशीलन करने के बाद
जो पुरुष इस योगवासिष्ठ में मोक्ष के लिए बतलाये गये छः प्रकरणों का विचार करेगा उसका फिर इस
अनेकविध दुःखो से भरे हुए संसार मे आगमन नहीं होगा अर्थात् वह मुक्त हो जायेगा । (८3)
हे शत्रुनाशक, पहले छप्पन हजार श्लोकपरिमित पूर्व और उत्तर दो खण्डों से युक्त इस रामायण
के अनादिकाल से अभ्यस्त राग, द्वेष आदि दोषों को दूर करनेवाले उत्तम-उत्तम उपदेशों से पूर्ण होने
के कारण महाबलवान् (महासामर्थ्य से युक्त) रामकथारूप (रामचरितवर्णनरूप) पूर्वखण्ड की (चौबीस
हजार श्लोक परिमित उत्तरकाण्ड सहित छ: काण्डों की) रचना कर मैंने उसे अनुग्रह और प्रेम से
एकाग्रचित्त होकर जैसे सागर रत्नार्थी को रत्न देता है, वैसे ही विनीत और मेघावी अपने प्रिय शिष्य
भरद्वाज को दिया