Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verses 26–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verses 26–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 26-30
संस्कृत श्लोक
लक्ष्मणो भरतश्चैव शत्रुघ्नश्च महामनाः ।
कौसल्या च सुमित्रा च सीता दशरथस्तथा ॥ २६ ॥
कृतास्त्रश्चाऽविरोधश्च बोधपारमुपागताः ।
वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणोऽष्टौ तथेतरे ॥ २७ ॥
धृष्टिर्जयन्तो भासश्च सत्यो विजय एव च ।
विभीषणः सुषेणश्च हनुमानिन्द्रजित्तथा ॥ २८ ॥
एतेऽष्टौ मन्त्रिणः प्रोक्ताः समनीरागचेतसः ।
जीवन्मुक्ता महात्मानो यथाप्राप्तानुवर्तिनः ॥ २९ ॥
एतैर्यथा हुतं दत्तं गृहीतमुषितं स्मृतम् ।
तथा चेद्वर्तसे पुत्र मुक्त एवासि संकटात् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
महामना लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, कौशल्या, सुमित्रा, सीता, दशरथ एवं राम के मित्र कृतास्त्र ओर
अविरोध, पुरोहित वसिष्ठ, वामदेव, ये सभी परमज्ञानी थे। रामचन्द्रजी के धृष्टि, जयन्त, भास, सत्य
अर्थात् सत्यवक्ता विजय, विभीषण, सुषेण, हनुमान् ओर सुग्रीव का अमात्य इन्द्रजित् ये आठ मन्त्री
भी महामना, जितेन्द्रिय, समदर्शी, विषयों मेँ आसक्ति से रहित, प्राप्त प्रारब्ध कर्मो के नाश की प्रतीक्षा
करनेवाले एवं जीवन्मुक्त थे । हे वत्स भरद्वाज, ये लोग जिस प्रकार ओर जिस भाव से श्रुति और स्मृति
में कहे गये होम, दान आदि श्रौत-स्मार्त कर्म, आदान, प्रदान आदि लौकिक सब व्यवहार ओर इष्टचिन्तन
आदि विहित कर्म का अनुष्ठान करते थे, तुम भी यदि वैसे ही कर सको, तो तुम भी अनायास संसाररूपी
संकट से मुक्त हो जाओगे