Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अपारसंसारसमुद्रपाती लब्ध्वा परां युक्तिमुदारसत्त्वः ।
न शोकमायाति न दैन्यमेति गतज्वरस्तिष्ठति नित्यतृप्तः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अधिक क्या कहूँ, उत्कृष्ट ज्ञानबल से युक्त व्यक्ति अपार
संसारसागर में गिरने पर भी इस परम योग को प्राप्त कर इष्टवियोग से उत्पन्न शोक, दुःख, दीनता
आदि संकटों से मुक्त हो कर नित्य तृप्त हो जाता है