Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
तथा व्यवहर प्राज्ञ यथा व्यवहृतः सुखी ।
सर्वासंसक्तया बुद्ध्या रामो राजीवलोचनः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
महामते भरद्वाज, कमलनयन राम सम्पूर्ण विषयों को मिथ्या समझ कर उनमें
आसक्ति का त्यागकर जैसे लोकयात्रा का निर्वाह करने से सुखी हुए थे, तुम भी वैसे ही व्यवहार करो,
वैसा करने से सुखी हो सकोगे