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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 2, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

दिवि भूमौ तथाकाशे बहिरन्तश्च मे विभुः । यो विभात्यवभासात्मा तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

-मंगलादीनि मंगलमध्यानि इत्यादि पातंजल महाभाष्य में दर्शित श्रुति के अनुसार रचे जानेवाले महाशास्त्र की निर्विघ्न परिसमाप्ति और प्रचार आदि के लिए मध्य में भी सर्वावभासक चिद्घनमूर्ति प्रत्यगभिन्न परब्रह्म का नमस्काररूप मंगलाचरण करते हुए ग्रन्थकार इस शास्त्र के विषय और प्रयोजन को भी अर्थतः कहते हैं। जो स्वर्ग में, भूमि में, आकाश में, हमारे अन्दर और बाहर निरन्तर विराजमान है, अर्थात्‌ जिसकी सत्ता और प्रकाश से यह सम्पूर्ण प्रपंच सत्तावान्‌ और प्रकाशित होता है, उस सर्वात्मा और सर्वावभासक परब्रह्म परमात्मा को नमस्कार है। (०३ )

सर्ग सन्दर्भ

पहला सर्ग समाप्त दूसरा सर्ग अधिकारी, षट्काण्डात्मक पूर्वरामायण के साथ इस ग्रन्थ का सम्बन्ध ब्रह्मा के आदेश से इस ग्रन्थ का निर्माण तथा मुक्तो की चर्या का वर्णन |