Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 65–66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 65–66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 65-66
संस्कृत श्लोक
भृगुणैवं कुमारेण शापितो देवशर्मणा ।
वृन्दया शापितो विष्णुस्तेन मानुष्यतां गतः ॥ ६५ ॥
एतत्ते कथितं सर्वे शापव्याजस्य कारणम् ।
इदानीं वच्मि तत्सर्वे सावधानमतिः शृणु ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
भक्तवत्सल भगवान ने इस प्रकार भृगु, सनत्कुमार, वृन्दा एवं देवदत्त द्वारा
अभिशप्त होकर मनुष्यजन्म धारण किया और उनके शापानुसार तत्-तत् कार्य स्वीकार किये ।
अभिशापरूपी छल का कारण मैंने आपसे कहा । अब मैं प्रस्तावित कथा कहता हूँ, सावधान होकर
सुनिये । भगवान् ने अपनी शक्ति के द्वारा शापमोचन में समर्थ होकर भी भक्तवत्सलता के कारण
भक्तों की मर्यादा की रक्षा के लिए तत्-तत् कार्य किये । भृगु ओर वृन्दा के शाप से उनका स्त्रीवियोग
ओर देवदत्त के शाप से गर्भवती सीता से वियोग हुआ । महाराज, जिस जिस कारण से भूतभावन
भगवान् अभिशप्त हुए थे, वह सब आपसे मैं कह चुका हूँ । अब मोक्ष के उपायभूत साधनों के विषय में
आपने मुझसे जो जिज्ञासा की है, उसके लिए बत्तीस हजार श्लोकों का योगवासिष्ठनामक महारामायण
आपके निकट कहता हूँ