Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 63–64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 63–64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 63-64
संस्कृत श्लोक
भार्या हि देवदत्तस्य पयोष्णीतीरसँस्थिता ।
नृसिंहवेषधृग्विष्णुं दृष्ट्वा पञ्चत्वमागता ॥ ६३ ॥
तेन शप्तो हि नृहरिर्दुःखार्तः स्त्रीवियोगतः ।
तवापि भार्यया सार्धं वियोगो हि भविष्यति ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
वृन्दा को विमोहित कर उसका पतिव्रत्य भंग किया, इसलिए वृन्दा ने भी उन्हें शाप दिया कि हे विष्णु,
तुमने छल करके मेरा पातिव्रत्यभंग किया और मुझे संतापित किया, अतः मेरे वाक्य से तुमको भी
रत्रीवियोगजनित दुःख का अनुभव करना पड़ेगा ॥ ६ २॥ भगवान ने जब नृसिंहरूप धारण किया था तब
गर्भवती देवदत्त की भार्या ने उनका विकरालस्वरूप देखकर पयोष्णी नदी के किनारे प्राण छोड़ दिये
थे । इसलिए उसके स्वामी देवदत्त ने भार्या के वियोग से दुःखी होकर यह शाप दिया कि आपने जैसे मुझे
स्त्ीवियोग से दुःखी किया वैसे ही आप भी कुछ काल के लिए अपने स्वरूप को भूलकर स्त्रीवियोग से
दुःखी होगे ।