Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 60–62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 60–62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 60-61
संस्कृत श्लोक
तेनापि शापितो विष्णुः सर्वज्ञत्वं तवास्ति यत् ।
किंचित्कालं हि तत्त्यक्त्वा त्वमज्ञानी भविष्यसि ॥ ६० ॥
भृगुर्भार्यां हतां दृष्ट्रा ह्युवाच क्रोधमूर्च्छितः ।
विष्णो तवापि भार्याया वियोगो हि भविष्यति ॥ ६१ ॥
वृन्दया शापितो विष्णुश्छलनं यत्त्वया कृतम् ।
अतस्त्वं स्त्रीवियोगं तु वचनान्मम यास्यसि ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सुनकर सनत्कुमार ने भी अत्यन्त दुःखी होकर विष्णु को यह शाप दिया कि
आपको भी सर्वज्ञता का परित्याग कर कुछ काल तक अज्ञ जीव की भाँति रहना पड़ेगा । महर्षि भृगु ने भी
विष्णु द्वारा अपनी भार्या का विनाश देखकर क्रोधवश उन्हें यह शाप दिया था कि 'हे विष्णु, जैसे तुमने
मुझे स्त्रीवियोगजनित दुःख से दुःखित किया, वैसे ही तुम्हें भी स्त्रीवियोगजनित दुःख का अनुभव करना
पड़गा((-्)