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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, Verses 57–59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 1, verses 57–59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 57-59

संस्कृत श्लोक

वाल्मीकिरुवाच । सनत्कुमारो निष्काम अवसद्ब्रह्मसद्मनि । वैकुण्ठादागतो विष्णुस्त्रैलोक्याधिपतिः प्रभुः ॥ ५७ ॥ ब्रह्मणा पूजितस्तत्र सल्यलोकनिवासिभिः । विना कुमारं तं दृष्ट्रा ह्युवाच प्रभुरीश्वरः ॥ ५८ ॥ सनत्कुमार स्तब्धोऽसि निष्कामो गर्वचेष्टया । अतस्त्वं भव कामार्तः शरजन्मेति नामतः ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

वाल्मीकिजी ने कहा : राजन्‌ ! कामक्रोध रहित ओर परम ज्ञानी ब्रह्मा के मानसपुत्र सनत्कुमार एक समय ब्रह्मलोक में बैठे थे उसी समय त्रलोक्याधिपति भगवान्‌ विष्णु वैकुण्ठ से वहाँ पधारे । सत्यलोक में निवास करेवाले अन्यान्य देवताओं के साथ ब्रह्मा ने अभ्युत्थान आदि से उनका सत्कार किया । केवल सनत्कुमार ने, अपने को निष्काम समझकर, उनका अभ्युत्थान आदि नहीं किया । यह देखकर भगवान्‌ विष्णु ने कहा : सनत्कुमार, तुम अहंकारी हो, तुम्हारी चेष्टा गर्वसूचक है, इस कारण तुम कार्तिकेय नाम से विख्यात ओर कामासक्त होओगे