महाभारत | अनुशासन पर्व
लेखक: Nripendra Mishra | स्रोत: महाभारत, अनुशासन पर्व
सारांश
महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को रुक्मिणी और लक्ष्मी जी के एक दुर्लभ संवाद का वर्णन किया। इस संवाद में लक्ष्मी जी स्वयं बताती हैं कि वे किन पुरुषों, स्त्रियों और स्थानों में निवास करती हैं और किनसे सदा दूर रहती हैं।
कभी न कभी मन में यह प्रश्न उठता है कि कुछ लोग चाहे जितना परिश्रम करें, सुख-समृद्धि उनके पास टिकती नहीं। और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके घर में बिना किसी विशेष प्रयास के भी लक्ष्मी बनी रहती है। आखिर ऐसा क्यों? लक्ष्मी जी किसके पास रहती हैं और किसके पास नहीं, इस प्रश्न का उत्तर न किसी ज्योतिषी के पास है, न किसी उपाय-टोटके में। यह उत्तर स्वयं लक्ष्मी जी के श्रीमुख से सुनिए।
महाभारत के अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर महाराज ने शरशय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह से इसी विषय पर प्रश्न किया। भीष्म पितामह ने उत्तर में कहा — "युधिष्ठिर, मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुनाता हूँ।" और फिर उन्होंने रुक्मिणी और लक्ष्मी जी के उस संवाद का वर्णन किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
रुक्मिणी उवाच —
कस्मिन् पुरुषे तिष्ठसि कस्यां स्त्र्यां वसस्यथ।
कस्मिन् देशे च काले च वद मे पुण्डरीकाक्षि॥
महाभारत, अनुशासन पर्व
रुक्मिणी जी ने पूछा — "हे कमलनयनी! आप किस पुरुष में, किस स्त्री में, किस देश में और किस काल में निवास करती हैं — यह मुझे बताइए।"
रुक्मिणी का प्रश्न
एक बार रुक्मिणी जी और लक्ष्मी जी आपस में बातें कर रही थीं — जैसे दो सखियाँ निश्चिन्त होकर बैठी हों। रुक्मिणी जी के मन में बड़े दिनों से एक जिज्ञासा थी। उन्होंने लक्ष्मी जी से पूछा — "सखी, यह तो बताओ — तुम रहती कहाँ हो? किस पुरुष के पास, किस स्त्री के पास, किस स्थान पर? और किनसे तुम दूर भागती हो?"
लक्ष्मी जी मुस्कुराईं। बोलीं — "सखी, पूछा है तो बताती हूँ। ध्यान से सुनो।"
लक्ष्मी जी कहाँ निवास करती हैं
लक्ष्मी जी ने कहा, "जो पुरुष सदा नारायण का ध्यान धरते हैं, जो जितेन्द्रिय हैं, जो नित्य एक आचरण वाले हैं, मैं वहीं रहती हूँ। जो वेद और शास्त्र में निपुण हैं, जो सत्संग करते हैं, जो ब्राह्मणों और अतिथियों का आदर करते हैं, उनके यहाँ मेरा स्थायी निवास होता है।"
जो पुरुष नारायण का ध्यान करते हैं
जितेन्द्रिय और नित्यमूर्ति पुरुष
वेद-शास्त्र में निपुण, सत्संगी
ब्राह्मणों और अतिथियों का आदर करने वाले
पतिव्रता स्त्रियाँ
गौ-सेवा करने वाले
जहाँ यज्ञ, धर्म और गौ हों
हंसों से सुशोभित नदी-तट और कोकिलों से युक्त वन
लक्ष्मी जी बोलती रहीं, "जिस घर में पतिव्रता स्त्री हो, जहाँ गाय की सेवा होती हो, जहाँ ब्राह्मण, यज्ञ और धर्म का वास हो, वहाँ मैं स्वयं चली आती हूँ। कोई बुलाता नहीं।"
लक्ष्मी जी कहाँ नहीं रहतीं
फिर लक्ष्मी जी का स्वर थोड़ा गंभीर हुआ। वे बोलीं, "और सखी, जिनसे मैं सदा दूर रहती हूँ, वे भी सुन लो।"
चोर, क्रूर और दुष्ट स्वभाव के लोग
जो तीनों संध्याओं में सोते हैं
जो पाप में लिप्त और इन्द्रियों के वश में हैं
जो ऊपर से भव्य दिखते हैं पर भीतर से दुष्ट हैं
निर्लज्ज और असंयमी पुरुष
जो न वेद जानते हैं, न धर्म मानते हैं
"जो बाहर से बड़े शालीन दिखते हैं पर भीतर से कपट रखते हैं, उनके पास मैं क्षण भर को भी नहीं ठहरती। जो तीनों संध्याओं में यानी प्रात:, मध्याह्न और सायं सोते रहते हैं, वे मुझे पाने की कामना करें तो भी मैं उनसे दूर ही रहती हूँ।"
रुक्मिणी जी ने यह सब सुना और मन-ही-मन समझ गईं कि लक्ष्मी का निवास किसी उपाय या तंत्र से नहीं, बल्कि आचरण और भाव से मिलता है।
जीवन से जोड़कर देखें
आज के युग में भी यही सत्य लागू होता है। जो लोग अपने दिन की शुरुआत ईश्वर-स्मरण से करते हैं, जो अपनी इन्द्रियों पर संयम रखते हैं, जो घर में बड़ों का आदर और अतिथियों का सत्कार करते हैं — उनके यहाँ समृद्धि अपने आप आती है। और जो व्यक्ति दिन के आरम्भ को ही आलस्य में गँवाते हैं, जिनके व्यवहार में कपट है — उनके लाख उपाय करने पर भी लक्ष्मी नहीं टिकती।
महाभारत का यह प्रसंग हमें यह नहीं बताता कि कौन सा व्रत करो या कौन सा उपाय करो। यह बताता है कि अपना आचरण सुधारो — लक्ष्मी स्वयं आएंगी।
सामान्य प्रश्न
यह संवाद किस ग्रन्थ में है?
यह संवाद महाभारत के अनुशासन पर्व में है। भीष्म पितामह ने शरशय्या पर लेटे हुए युधिष्ठिर को रुक्मिणी और लक्ष्मी जी के इस वृत्तान्त का वर्णन किया था।
लक्ष्मी जी किन पुरुषों में निवास करती हैं?
जो पुरुष नारायण का ध्यान करते हैं, जितेन्द्रिय हैं, वेद-शास्त्र में निपुण हैं, सत्संगी हैं और ब्राह्मण-अतिथि का सम्मान करते हैं — लक्ष्मी जी ऐसे पुरुषों में निवास करती हैं।
लक्ष्मी जी किनसे दूर रहती हैं?
चोर, क्रूर, दुष्ट, असंयमी, तीनों संध्याओं में सोने वाले और ऊपर से भव्य पर भीतर से कपटी लोगों से लक्ष्मी जी सदा दूर रहती हैं।
रुक्मिणी जी ने लक्ष्मी जी से यह प्रश्न क्यों पूछा?
यह एक सखी-भाव का संवाद है। रुक्मिणी जी की जिज्ञासा थी कि लक्ष्मी जी का वास किसके यहाँ होता है। इसी जिज्ञासा के उत्तर में लक्ष्मी जी ने यह सारा वर्णन किया।
क्या लक्ष्मी प्राप्ति के लिए केवल पूजा-पाठ पर्याप्त है?
इस प्रसंग के अनुसार नहीं। लक्ष्मी जी स्वयं कहती हैं कि वे आचरण, संयम, सत्संग और सेवा-भाव से आकर्षित होती हैं — केवल बाहरी उपायों से नहीं।
लेखक: Nripendra Mishra | स्रोत: महाभारत, अनुशासन पर्व — भीष्म-युधिष्ठिर संवाद, रुक्मिणी-लक्ष्मी संवाद प्रसंग। गीता प्रेस, गोरखपुर संस्करण।
नोट: इस लेख में दिए गए सभी तथ्य मूल ग्रन्थ पर आधारित हैं। कोई काल्पनिक तथ्य नहीं जोड़ा गया है।
