एक बार किसी ने रमण महर्षि से पूछा — "मुझे परमात्मा का अनुभव कब होगा?" रमण महर्षि ने कहा — "तुम्हें परमात्मा का अनुभव नहीं होगा।" वह हैरान हुआ — "क्यों?" महर्षि ने कहा — "क्योंकि तुम परमात्मा हो। अनुभव वही करता है जो अलग हो। जो एक है — वह अनुभव कैसे करे?"
यह उत्तर सुनने में अजीब लगता है। पर इसमें पूरा वेदांत छिपा है।
आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता — यह "प्राप्त" नहीं होती, "जानी" जाती है। और जानने के लिए क्या करना पड़ता है — यही इस लेख का विषय है।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्रीमद्भागवत — "सृष्टि से पहले मैं था, सृष्टि के रूप में भी मैं हूँ"
सृष्टि के पूर्व केवल मैं-ही-मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनों का कारण अज्ञान। जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं-ही-मैं हूँ। इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ। और जो कुछ बचेगा, वह भी मैं ही हूँ।
श्रीमद्भागवत — द्वितीय स्कंध, भगवान् द्वारा ब्रह्माजी को चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश
भगवान् ने ब्रह्माजी को सबसे पहला और सबसे गहरा ज्ञान यह दिया। "पहले भी मैं, बाद में भी मैं, और यह जो दिख रहा है — वह भी मैं।" यानी आत्मा और परमात्मा में भेद है ही नहीं। भेद केवल दृष्टि का है।
साधन क्या है? यह ज्ञान सुनना, मनन करना और धीरे-धीरे इसे अनुभव करना। श्रीमद्भागवत यही ज्ञान का पहला साधन बताता है — श्रवण।
२. श्रीमद्भागवत — माया को समझना — अभिन्नता जानने का द्वार
वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या प्रतीत हो रही है — इसे मेरी माया समझना चाहिए।
श्रीमद्भागवत — द्वितीय स्कंध, चतुःश्लोकी भागवत
"दो चंद्रमा" — यह उपमा बहुत सुंदर है। आँख दबाओ — एक चंद्रमा दो दिखने लगता है। पर असली चंद्रमा एक ही है। वैसे ही आत्मा और परमात्मा "दो" लगते हैं — पर हैं एक।
माया को समझना — यह अभिन्नता अनुभव करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। जब यह पता चले कि "अलगपन" माया का खेल है — तो भेद की दीवार पतली होने लगती है।
३. श्रीमद्भागवत — तपस्या और एकाग्र जप — अभीष्ट फल का मार्ग
मैंने तुम्हें जो यह परमपुरुष परमात्मा का स्तोत्र सुनाया है — इसे एकाग्रचित्त से जपते हुए महान् तपस्या करो। तपस्या पूर्ण होने पर इसी से तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जाएगा।
श्रीमद्भागवत — चतुर्थ स्कंध, भगवान् रुद्र का उपदेश
यहाँ दो साधन एक साथ बताए गए — एकाग्र जप और तपस्या। एकाग्र जप यानी मन को भटकने न देना — एक ही बिंदु पर टिकाना। और तपस्या यानी साधना में निरंतरता — बिना थके, बिना रुके।
और "अभीष्ट फल" — शास्त्र यहाँ भी वादा करता है। जो सच्चे मन से, एकाग्रता से साधना करे — उसे मिलेगा। यह केवल दर्शनशास्त्र नहीं — यह प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग है।
४. श्री योगवासिष्ठ — दीवार पर चित्र — जगत चिदाकाश का स्फुरण है
जैसे केवल दिखाई देने वाला चित्रलिखित जगत् केवल दीवारमात्र है — वैसे ही चित् में आभासमात्र यह जगत् चिदाकाशमात्र स्वरूप ही है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग १६८
दीवार पर चित्र बना हो — पहाड़, नदी, लोग। पर वे सब केवल दीवार हैं। वैसे ही यह सारा संसार — लोग, रिश्ते, घटनाएं — सब चिदाकाश (चेतना) का ही चित्र हैं।
यह बोध — कि सब चेतना ही है — अभिन्नता का सबसे सीधा अनुभव है। जब हर चीज़ में वही चेतना दिखे — तो "मैं अलग हूँ" का भाव कहाँ से आएगा?
५. श्री योगवासिष्ठ — ज्ञान ही परमात्मा का स्वरूप है
ज्ञान ही परमात्मा का असली स्वरूप है और संसार का अभाव भी ज्ञानरूप ही है। निर्वाण से भिन्न "अहम्" यह भ्रमरूप सत्ता तो एकमात्र दुःख के लिए ही है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ४३
"ज्ञान ही परमात्मा का स्वरूप है" — यह सुनने में कठिन लगता है, पर गहरे उतरने पर सरल हो जाता है। परमात्मा कोई चीज़ नहीं जो "वहाँ" है — वह वह चेतना है जो जानती है। और जानना — यही ज्ञान है।
और "अहम् — भ्रमरूप सत्ता — दुःख के लिए है।" यानी अहंकार का "मैं" — यह दुःख का मूल है। जब यह "मैं" शांत हो — ज्ञान और परमात्मा एक हो जाते हैं।
६. श्री योगवासिष्ठ — "वह ब्रह्म है, वह हरि है, वह सब कुछ है"
वह ब्रह्म है, वह हरि है, वह इंद्र है, वह अक्षर परम स्वराट् है। वही विष्णु है, वही प्राण है, वही काल है, वही अग्नि है, वही चंद्रमा है। वही सब कुछ है जो हो चुका है और जो भविष्य में होगा। उसे जानकर मृत्यु को पार कर जाता है — मुक्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ८३
यह श्लोक पढ़ते हुए एक अद्भुत अनुभव होता है। ब्रह्म भी वही, हरि भी वही, काल भी वही, अग्नि भी वही, चंद्रमा भी वही। यानी जो भी है — सब उसी एक का रूप है।
और साधन? "उसे जानकर।" बस इतना। इस एकत्व को जान लो — मृत्यु का भय नहीं रहता, मुक्ति अपने आप आती है।
७. श्रीमद्भगवद्गीता — कमल का पत्ता — कर्म करो पर लिप्त मत हो
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है — वह जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ५, कर्म-संन्यास योग
कमल का पत्ता — पानी में रहता है, पानी से जीता है — पर पानी उस पर नहीं टिकता। यही कर्मयोग है। संसार में रहो, काम करो — पर उससे चिपको मत।
और यह कैसे होता है? "कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके।" जब हर काम भगवान् को समर्पित हो — तो "मेरा" का भाव कम होता है। और "मेरा" कम होते-होते — एक दिन "मैं" भी परमात्मा में मिल जाता है।
८. श्रीमद्भगवद्गीता — त्रिगुणों से परे — शुद्ध चेतना में स्थित होना
हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों का प्रतिपादन करने वाले हैं — इसलिए तू उन भोगों में आसक्तिहीन हो।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २, सांख्य योग
गीता यहाँ एक बड़ी बात कह रही है — वेद भी गुणों के कार्यों का वर्णन करते हैं। पर भगवान् कह रहे हैं — "तू उससे परे हो।" यानी शास्त्र पढ़ो — पर उसमें अटको मत। भोगों की इच्छा छोड़ो।
जब गुणों की आसक्ति छूटती है — तो जो बचता है वह शुद्ध चेतना है। वही आत्मा है। वही परमात्मा है। वहाँ कोई भेद नहीं।
समग्र समझ
तीनों शास्त्र मिलकर अभिन्नता अनुभव करने के साधनों की एक पूरी सूची देते हैं। श्रवण — शास्त्र और गुरु का। मनन — उस ज्ञान पर चिंतन। निदिध्यासन — उसे भीतर उतारना। कर्मार्पण — हर काम भगवान् को देना। तपस्या — साधना में निरंतरता। माया का बोध — भेद को समझना। और वैराग्य — गुणों और भोगों से अनासक्ति।
यह सब अलग-अलग साधन नहीं हैं — एक ही यात्रा के पड़ाव हैं। और यात्रा कहाँ खत्म होती है? जहाँ रमण महर्षि ने कहा था — "तुम परमात्मा हो।" यानी जहाँ यात्रा शुरू हुई थी — वहीं।
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| अभिन्नता | आत्मा और परमात्मा का एक होना | Non-duality — oneness of Atman and Paramatman |
| चिदाकाश | चेतना का असीम आकाश — परमात्मा | The infinite sky of pure consciousness |
| माया | वह शक्ति जो एकता को दो दिखाती है | Illusion — makes the One appear as two |
| कर्मयोग | निष्काम कर्म — फल ईश्वर को अर्पित | Path of selfless action offered to God |
| वैराग्य | गुणों और भोगों से अनासक्ति | Dispassion from pleasures and worldly objects |
| तपस्या | साधना में निरंतरता और एकाग्रता | Austerity — consistent and focused spiritual practice |
| श्रवण-मनन-निदिध्यासन | सुनना-सोचना-अनुभव करना | Listening, reflection, and deep contemplation |
जीवन में उपयोग
अभिन्नता के अनुभव की दिशा में एक सरल अभ्यास — आज से हर काम करते हुए एक बार मन में कहें: "यह मैं नहीं कर रहा — यह हो रहा है।" और काम खत्म होने पर: "यह भगवान् को।" यह दो वाक्य — कर्मयोग का सार हैं।
और रोज़ एक बार — बस पाँच मिनट — चुपचाप बैठें और पूछें: "अभी जो जान रहा है — वह कौन है?" इस प्रश्न का उत्तर मत ढूँढें — बस प्रश्न में रहें। उस ठहराव में — जो है — वही आत्मा है। वही परमात्मा है।
Sources
- Shrimad Bhagwat Puran — Dwitiya Skandh / भगवान् द्वारा ब्रह्माजी को चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश
- Shrimad Bhagwat Puran — Chaturth Skandh / भगवान् रुद्र का उपदेश
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग ४३, ५२, ८३, १६८
- Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 5, Karma Sannyasa Yoga
- Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 2, Sankhya Yoga
