Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 57
छप्पनवाँ सर्ग समाप्त सत्तावनवाँ सर्ग ज्ञानी और अज्ञानी के अहंकार के विशेष ज्ञान के लिए ज्ञान से बाधित हुए दृश्यप्रपंच की चिन्मात्रता का समर्थन।
33 verse-groups
- Verse 1भां... अहमिति ग्रस्तः पिशाचः“ इस कथन तथा श्रोन्नामसन्नमन वायुरिवोग्रवृक्षम्” इस हृष्टान्…
- Verse 2एकमात्र प्रारब्धशेष का भोय ही प्रयोजन होने से जले हुए करत्र- जैसे देहधारण के निरित्त केवल…
- Verse 3॥ किन्तु इसमें शान्त चित्तवाले ज्ञानी पुरुष के लिए जो यह विशेष बात है, उसे आप सुनिये, जिस…
- Verse 4इस अज्ञानरूपी बालक ने अपने अन्तःकरण में अविद्यमान ही अहंभावरूपी पिशाच की कल्पना कर रक्खी…
- Verse 5ठीक हैं, ऐसा ही सही, लेकिन इससे प्रक्रत में क्या आया ? इस पर कहते हैं / तत्त्वज्ञानी यदि…
- Verse 6तथा जानवार्नो को ज्यों- ज्यों अपना अनुभव बढ़ता जाता है त्यो-त्यो करमशः अज्ञान का नाश भी ह…
- Verse 7इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि अविद्या रहने पर ऐसे बारबार अज्ञता उदित होती है, जैसे रात में…
- Verse 8अविद्या की सृष्टि रहने पर ही उसका अस्तित्व भी है, अन्य किसी दूसरे कारण से कहीं नहीं है ।…
- Verse 9ऐसा ही सही, पर इससे प्रक्रत मे क्या आया, इस पर कहते हैं । अज्ञानी द्वारा ज्ञात यह संसार उ…
- Verse 10कारण के अभाव का उपपादन करते हैं / जब चिदाकाश कोश के भीतर स्थित आदि सृष्टि ही निर्विकार ब्…
- Verse 11मन को लेकर छः इन्द्रियो से ज्ञात न होनेवाला निराकार ब्रह्म मनयुक्त छः इन्द्रियो से ज्ञात…
- Verse 12बीजरूप कारण से अंकुररूप कार्य उत्पन्न होता है, इसमें तो तनिक भी सन्देह नहीं है । फिर जहाँ…
- Verse 13कारण के बिना कार्य नहीं होता, यह तो सभी को विदित है । आकाश में लहलहा रहे प्रत्यक्ष वृक्ष…
- Verse 14यदि वह छरष्टि उत्पन्न ही नहीं है, तो फिर कोन उत्त रूप से भाता है. उसको दुष्टान्तपूर्वक बत…
- Verse 15एवं सृष्टि के आरम्भकाल में जो यह अर्गलाशून्य सृष्टि की स्थिति चिदाकाश में अनुभूत होती है,…
- Verse 16तब क्या एकमात्र शून्य ही जृष्टिकप से भासित होता है इस पर नहीं यह उत्तर देते हैं / विषयसृष…
- Verse 17अविकृत ब्रह्म ही विकृत जगद्रूप से जो स्फुरित होता है उसमें स्वप्न का स्वात्मा ही दृष्टान्…
- Verse 18जैसे यहाँ स्वप्न में जो सृष्टि-सा प्रतीत होता है वह चित्स्वभाव सृष्टिरहित स्वात्मा में ही…
- Verse 19सृष्टि के प्रारम्भ में विषयज्ञानशून्य, शुद्ध, एक, अज, अव्यय आदि ओर अन्त से शून्य जो परमात…
- Verse 20हे श्रीरामचन्द्रजी, परब्रह्म परमात्मा में यह सृष्टि नहीं है ओर न ये पृथिवी आदि लोक ही हैं…
- Verse 21सर्वशक्तिसम्पन्न वह ब्रह्म जैसे जिस तरह का स्फुरित होता है, वह अपने तुच्छरूप का परित्याग…
- Verse 22जैसे स्वप्न का नगर प्राणी के लिए चिन्मात्र का विलास ही है । वैसे ही सृष्टि के प्रारम्भ मे…
- Verse 23स्वच्छ चिद्रूप परमाकाश में जो चिदाकाश स्थित है उसी ने अपने स्वभाव की सृष्टिरूप में भावना…
- Verse 24भाव्य, भावक आवि त्रिपुटी श्रमिर्यो की एक र में उत्पत्ति कैसे, इस पर कहते है/ भाव्य, भावक…
- Verse 25ऐसा स्थित होने पर कहाँ से सृष्टि, कहाँ से अविद्या, कहाँ अज्ञता और कहाँ अहंकार आदि स्थित ह…
- Verse 26अज्ञान रहने पर ही अहंभाव बाधा पहुँचाता है, ज्ञान होने पर नहीं; यह कहते हैं । हे श्रीरामचन…
- Verse 27इससे आपके प्रश्न का समाधान हो गया, यह दिखलाते हैं / इस तरह जब इस अहंकार को मैं पूर्णतया ज…
- Verse 28चित्रलिखित अग्नि में अध्यस्त दहन क्रिया जैसे दाह्य वस्तुओं मे निष्फल होती है, वैसे ही अहं…
- Verse 29इस प्रकार समाधिकाल में अहंकार के त्याग तथा व्यवहारकाल में उसके राग में जब मेरी समता है तब…
- Verse 30एकमात्र सम्बन्धत्यागर से भी यह अहम्भाव पीड़ा नहीं पहुँचाता, फिर ज्ञान से बाधित हो जाने पर…
- Verse 31यह अहंभावादि बोधविभ्रम जिस तरह मेरी दृष्टि में नहीं है, वैसे ही तत्त्वज्ञानी ओर महानुभावो…
- Verse 32आप भरी मेरे समान ही भीतर से सबका बाध करके अद्वितीय बन जाइये, यह कहते हैं / वास्तव में तो…
- Verse 33हे श्रीरामचन्द्रजी, चिरकाल के लिए सम्पूर्ण भावों का अपहव करके अवकाशरहित पत्थर के सदृश बनक…