Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अज्ञानमपि नास्त्येव प्रेक्षितं यन्न लभ्यते ।
विचारिणा दीपवता स्वरूपं तमसो यथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक हैं, ऐसा ही सही, लेकिन इससे प्रक्रत में क्या आया ? इस पर कहते हैं /
तत्त्वज्ञानी यदि विचारकर देखे तो अज्ञान भी उसे बिलकुल ऐसे उपलब्ध नहीं होता, जैसे
दीपधारी पुरुष को अन्धकार का स्वरूप