Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
चित्स्वभावे यथा स्वप्ने आस्ते सर्ग इवेह यः ।
असर्गे सर्गवद्भाति तथा पूर्व महाम्बरे ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे यहाँ
स्वप्न में जो सृष्टि-सा प्रतीत होता है वह चित्स्वभाव सृष्टिरहित स्वात्मा में ही विद्यमान है वैसे ही
यहाँ ज्ञान से पूर्व सर्ग-सा जो प्रतीत होता है वह सर्गशून्य चित्स्वभाव महाचिदाकाश में ही प्रतीत
होता है