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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 203, Verses 4–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 203, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 203 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

जालं मुक्ताकलापानन्तरमाक्रान्तभास्करम् । ननर्तेव तरद्व्योम विज्ञानश्रवणादिव ॥ ४ ॥ एवं निर्वृतिमायाते रामे स्वकुलकैरवे । मुनीन्द्रवदनालोकात्सविकासमिव स्थिते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

शान्त अन्तःकरणवाले राजा दशरथ प्रसन्नता से अत्यन्त सुशोभित हुए । वे अत्यंत सन्तोष से पूर्णतया रोमांचित शरीर हो एक अपूर्व शोभा को प्राप्त हुए। इसके पश्चात्‌ ज्ञानी पुरुषों में बहुत-सी साधुवाद कथाओं के प्रवृत्त होने पर श्रीरामचन्द्रजी ने, जिनका अज्ञान छूट गया था, पुनः यह वचन कहा