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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 199, Verses 43–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 199, verses 43–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 199 · श्लोक 43,44

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

किसी को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचानेवाला पुरूष मरण की आकांक्षा न करे और जीवन की अभिवांछा भी न करे किन्तु यथाप्राप्त सुंदर व्यवहार करता हुआ विचरण करे । समतावश जो गुण और दोषों को एक से जानता है, जिसकी दृष्टि में सुख-दुःख तथा ऊच और नीच योनियाँ समान हैं एवं मान और अपमान भी जिसके लिए तुल्य है, ऐसा जीवन्मुक्त पुरुष प्राकृत व्यवहारो में भी आसक्ति न होने के कारण पवित्रमूर्ति अतएव प्रकाशमान होकर लोकोपकार के लिए देश-विदेशों में विचरण करता है