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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 194

एक सौ बानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तिरानबेवाँ सर्ग प्रबोध से क्षणभर अज्ञानरूपी निद्रा का विनाश होने पर श्रीरामचन्द्रजी ने निखिल द्वैत से विनिर्मुक्त नित्य आत्म में स्थिति का वर्णन किया, यह वर्णन ।

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  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आदि ओर अन्त रहित जिस परमपदरूप ब्रह्म को न तो कर्म की उपा…
  2. Verse 2द्वैत ओर अद्वैत का अनुसन्धान करने पर मन में उदित हुआ जो द्वैत ओर अद्वैत का समुन्मेष है उस…
  3. Verse 3इस समय जगद्भान कैसे सम्पन्न हुआ ? इस प्रश्न पर उसे कहते है । जैसे आकाश में केशोण्ड्क, मोत…
  4. Verse 4जैसे आकाश में आकाशत्व अभेद से सामान्यरूप से ओर आकाशरूप से स्थित हे, जैसे पाषाण में पाषाणत…
  5. Verse 5भगवन्‌, दिशाओं मेँ ओर आकाश में असंख्यरूप से विस्तृत भी अहंकारादि सहित त्रिलोकीरूप दृश्यको…
  6. Verse 6अपरिच्छिन्न उदयवाले यानी सर्वव्यापी इस परम ब्रह्म का शास्त्राभ्यास तथा गुरुकृपा से साक्षा…
  7. Verse 7जड की (मूर्ख की) भाँति सांसारिक व्यवहार में अत्यन्त लिप्त हुए भी अजड की (ज्ञानी पुरुष की)…
  8. Verse 8आध्यात्मिक, आधिदैविक आदि त्रिविध संताप के आकारभूत अज्ञानरूपी सूर्य के सर्वदा के लिए कहीं…
  9. Verse 9उत्पत्ति ओर विनाशयुक्त कार्यो में, जरा, जन्म, मरण आदि में तथा व्यवहार विक्षेपो मे वेग से…
  10. Verses 10–11यहाँ वास्तव में न अज्ञान है, न भ्रम है, न दुःख है और न सुखोदय है । ज्ञान, अज्ञान, सुख, दु…
  11. Verses 12–15हे गुरुवर, आपकी कृपा से मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ, मेरी सकल कुदृष्टियाँ शान्त हो गई हैँ । इ…
  12. Verses 16–43भगवन्‌, सदा ही सब कुछ एक अनन्त मैं ही हूँ अथवा सब कुछ ओर कुछ भी नहीं तथा सकल उपद्रवो से र…