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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 194, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 194, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 194 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आदि ओर अन्त रहित जिस परमपदरूप ब्रह्म को न तो कर्म की उपासना से सिद्धि को प्राप्त हुए देवता लोग जानते हैं और न तपोयोग से सिद्ध ऋषि लोग जानते हैँ अथवा यहाँ पर चक्षु आदि बाहरी ओर आभ्यन्तर करण ही देवता ओर ऋषि कहे गये हैं । “ते ह देवा उद्गीथमाजहयुः । इमावेव गौतमभारद्वाजौ इत्यादि श्रुति है । वही यह जगत्‌ के रूप में स्फुरित है, कहाँ जगत्‌ है और कहाँ दृश्यता है ?

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ बानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तिरानबेवाँ सर्ग प्रबोध से क्षणभर अज्ञानरूपी निद्रा का विनाश होने पर श्रीरामचन्द्रजी ने निखिल द्वैत से विनिर्मुक्त नित्य आत्म में स्थिति का वर्णन किया, यह वर्णन ।