Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

अग्नेर्न पृथगुष्णत्वं पृथक् शैत्यं च नो हिमात् । चिद्व्योमैकात्मनः स्वच्छान्न जगत्पृथगीश्वरात् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

तब किसकी यह भ्रान्ति है ओर किसने ये जगत्‌ आदि नाम किये हैं 2 इसपर कहते है । इस प्रकार अपने स्वभाव का त्याग न कर रहे उसी ब्रह्म ने चित्‌ होने के कारण स्वयं स्वभावभूत स्वच्छ उसी ब्रह्मभान के ही यह जाग्रत्‌, यह स्वप्न, सुषुप्ति ओर तुर्य ये नाम, ब्रह्म अथवा आत्मा ये नाम अपने में किये हैँ ॥१६.१७॥ वास्तव में तो न स्वप्न है, न जाग्रत्‌ है, न सुषुप्ति है, न तुर्यावस्था है ओर न उनसे अतिरिक्त किन्तु सब कुछ शान्त परमाकाश ही है