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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verses 12–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, verses 12–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 12-15

संस्कृत श्लोक

वक्षि चेत्कथमेतस्माद्व्यर्थं तदनुभूयते । सर्गाद्यमुत्र स्वप्नादिष्वेषु कोऽपह्नवं भजेत् ॥ १२ ॥ तरावाकारवत्येषा कल्पना रचिता यथा । चितेराकाशमात्रायास्तथैषा कल्पना कृता ॥ १३ ॥ यथा गन्धादयः पुष्पे गगने शून्यतादयः । यथा स्पन्दादयो वायौ तथा बुद्ध्यादयः परे ॥ १४ ॥ यथा गन्धादयः पुष्पे गगने शून्यतादयः । यथा स्पन्दादयो वायौ तथेमाः सृष्टयश्चिति ॥ १५ ॥ यथा खानिलपुष्पाणां शून्यतास्पन्दगन्धदृक् । शून्यरूपानुभूता च तथा सर्गस्थितिश्चिति ॥ १६ ॥ न पृथक् शून्यता व्योम्नो न पृथग्द्रवताम्भसः । न पृथक् कुसुमाद्गन्धो नानिलात्स्पन्दन पृथक् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जाग्रत-स्वप्न जगत्‌ के अविद्या, निद्रा आदि दोष जनित होने के कारण तथा स्वप्रकाश चेतन में संप्रयोजन का उपयोग न होने के कारण यह जगद्भान विदधिष्ठानवाली भान्ति ही है, स्मृति नहीं है। जैसे वर्तमान अनुभव को स्मृति मानते हैं वैसे ही पूर्व पूर्व अनुभवों में भी स्मृतित्वापत्ति होने से स्मृति के मूलभूत अनुभव की अप्रसिद्धि होने का भय है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी समाधान करते है । चिदाकाशस्वरूप तथा पदार्थो का सत्तामात्र जो यह चित्‌ के चाकचक्य से प्रतीत होता है वही यह काकतालीय के समान आकस्मिक शरीरधारी बिना दीवार के चित्र-सा जगत्‌ है । वह यह अविनाशी शान्त जल में तरगों की नाई परमात्मा में सर्वत्र सदा विद्यमान रहता हे । सर्वात्मक निर्वाणरूप आकाशरूप निराकार परमात्मा मेँ स्वरूपभूत यह विना निमित्त के ही जिस किसी दोष से जब जब जैसा अन्दर भासित होता है वास्तव में कुछ न होता हुआ भी न सदा या न कदाचित्‌ यत्र तत्र वैसा प्रतीत होता हे