Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verses 32–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, verses 32–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 32-36
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
मुनि ने कहा : इसके बाद मन्त्री द्वारा इस प्रकार उक्त वह राजा सिन्धु राज्यभारविहीन बुद्धि
से उसी समय वहीं पर सारे राज्य को तिलांजलि दे देगा । दूर वन में चला जायेगा, मन्त्रियों के बहुत
अनुनय-विनय करनेपर भी फिर निष्कंटक उस विशाल राज्य को नहीं अपनायेगा | साधुओं के बीच
में सत्संग कर रहे सिन्धु में उनकी विचारपूर्ण ज्ञानमय कथाओं से फूलों के संसर्ग से सुगन्ध की तरह
विवेक उत्पन्न हो जायेगा । उसके पश्चात् कैसे यह जन्म हुआ, कहाँ से संसार आया, यों निरन्तर
विचार करने से वह जीवन्मुक्त हो जायेगा । वह राजा सिन्धु सत्संगतिवश नित्य विचारनिमग्न होकर
परम पावन उस मोक्षपद को प्राप्त होगा जिस मोक्षपद में हिरण्यगर्भ तक का ऐश्वर्य वायु से उड रहे
सुखे पत्ते की तरह उपादेय नहीं होता, किन्तु तुच्छ ही होता है